कहीं मना होगा रक्षाबंधन का जश्न लेकिन गंगदासपुर में तो नहीं। बाढ से बेहाल जिंदगी की जद्दोजहद में उलझे हुए गंगदासपुर के लोगों को पता ही नहीं चला कि रक्षाबंधन कब आया और कब गया।
उत्तराखंड में बाढ़ के कारण बेघर होकर वन विभाग की भूमि में पथरी के पास बीस किमी की दूरी पर रह रहे गंगदासपुर के बाढ़ पीड़ितों के घरों में रक्षा बंधन त्यौहार की मात्र औपचारिकताएं हुईं।
नहीं बांधी राखी
बहनें अपने भाईयों की कलाईयों पर रक्षा बंधन का सूत्र नहीं बांध सकी। दो महीने से बाढ़ की विभीषिका झेल रहे गंगदासपुर के बाढ़ पीड़ित ग्रामीणों के परिवार दो जगह बसने से बिखर गए है।
गांव में जमा पानी की दो महीने से उचित निकासी न होने से पानी में खड़े रहने से पशुओं के बीमार होने से व शौचालय आदि की व्यवस्था न होने से गंगदासपुर के लोगों ने गांव छोड़ दिया।
चारे के लिए गांव छोड़ा
इससे गांव की कुछ महिलाएं व बच्चे गांव में ही रह गए हैं और कुछ लोग पशुओं को लेकर चारे आदि की व्यवस्था कराने के लिए वन विभाग की भूमि में रहने को पहुंच गए।
गांव से बीस किमी की दूरी पर होने से बुधवार को इन लोगों के घरों में रक्षा बंधन के नाम पर मात्र औपचारिकताएं हुई। कुछ साधन संपन्न वाले ही लोग रक्षा बंधन ही मना सके, लेकिन साधनविहीन लोगों के घर में बहनें भाई की कलाई पर रक्षा बंधन का सूत्र नहीं बांध सकी।
कब आया त्योहार
बाढ़ पीड़ित राजकुमार, प्रकाशचंद, सतीश चौहान, गौतम आदि ने बताया कि बाढ़ ने उनका सबकुछ तबाह कर दिया है। उन्हें तो बस फिर से स्थापित होने की चिंता है, त्योहार कब आया और चला गया उन्हें पता ही नहीं चलता।
कहना है कि यदि घर में खुशहाली होती है तो त्यौहार मनाने की भी उत्सुकता होती है। लेकिन जब घर में कुछ भी नहीं है तो ऐसे में खाने के भी टोटे है।