सिल्ला गांव में साणेश्वर महाराज का प्राचीन मंदिर है। यहां पर समय-समय पर पंचगाई गांवों की ओर से भगवान की दिवारा यात्रा की जाती है। कई चरणों में होने वाली इस यात्रा में देवता ध्याणियों के गांवों का भ्रमण कर मूल स्थान लौटते हैं। मंदिर में एक माह तक धार्मिक अनुष्ठान व महायज्ञ होता है।
इस वर्ष शनिवार से साणेश्वर महाराज की दिवारा यात्रा हो रही है। गांव में तीन दिन तक अनुष्ठान होगा। इसमें शामिल होने के लिए ध्याणियां व प्रवासी ग्रामीण गांव पहुंच रहे हैं। मंगलवार को भगवान साणेश्वर देवता की डोली दिवारा यात्रा के तहत चमराड़ा गांव होते हुए अपने पहले पड़ाव फलई गांव पहुंचेगी।
दिवारा समिति के अध्यक्ष ग्राम पंचायत कोटी के प्रधान उम्मेद सिंह ने बताया कि पहले चरण में यात्रा चमराड़ा, फलई, रायड़ी, डांगी, सिनघाटा, कोटी, सोगना, कूड़ी, डोभा और डडोली का भ्रमण करेगी। ग्रामीण वीरपाल सिंह रावत ने बताया कि सिल्ला गांव में साणेश्वर महाराज की प्रतिदिन पूजा-अर्चना के साथ ही डेढ़ किलो चावल का भोग लगाया जाता है।
बदरीनाथ से है साणेश्वर महाराज का संबंध
मान्यता है कि हिमालय क्षेत्र में देवासुर संग्राम के दौरान मुनि महाराज अगस्त्यमुनि से सिल्ला गांव पहुंचे। यहां उन्होंने अपनी कोख के मैल से कुष्मांडा को पैदा किया, जिसने असुरों का वध किया। दो असुर भाग गए, जिसमें अतापी नामक असुर मंदाकिनी नदी में छिप गया और वितापी बरीनाथ धाम में शंख में छुप गया था। मान्यता है कि बदरीनाथ धाम में उसी दिन से शंख नहीं बजाया जाता। शंख बजने से यह असुर बाहर आ जाएगा और पुन: उत्पात मचाने लगेगा।