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जिले में सात हजार हेक्टयर कृषि भूमि घटी

Thu, 10 Dec 2015 06:50 PM IST
अमर उजाला रुद्रप्रयाग
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 वर्ष 1997 में अस्तित्व में आए रुद्रप्रयाग जिला एक दशक से समय-समय पर आपदा की मार झेल रहा है। इससे पलायन से गांव खाली हो रहे हैं। इसका असर कृषि पर व्यापक रूप से पड़ा है। पांच-छह वर्ष पहले जिन गांवों में गेहूं, धान, मंडुवे की फसल से हरे-भरे खेत लहलहाते थे, वहां अब जंगली घास और झाड़ियां उगी हुई हैं।
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खेतीबाड़ी के मामले में संपन्न माने जाने वाले गांवों में भी ग्रामीणों ने खेती करना छोड़ दिया है। अगस्त्यमुनि विकासखंड के पट्टी बच्छणस्यूं के गहड़, नवासू, नौना-दानकोट, बंगोली, निषणी ग्राम पंचायत के गांवों में 40 से 70 फीसदी परिवार खेतीबाड़ी छोड़ चुके हैं। कपलखील, ढिगणी, चाम्यूं, निषणी और तैली बंगोली में खेत बंजर पड़े हैं। यहीं स्थिति जखोली और ऊखीमठ ब्लाक के गांवों में भी देखने को मिल रही है।


आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2009-10 में जहां रुद्रप्रयाग में 2671 हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर थी, वहीं  वर्ष 2013-14 में यह बढ़कर 2821 हेक्टेयर पहुंच गई। पलायन व अन्य कारणों से 2010-11 में जहां 6895 हेक्टेयर कृषि भूमि अयोग्य हो गई थी, जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 6897 हेक्टेयर और वर्ष 2013-14 तक 8653 हेक्टेयर तक पहुंच गई। अगस्त्यमुनि ब्लाक में सर्वाधिक 5241 हेक्टेयर भूमि अयोग्य है।
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गायब हुई कई फसलें
रुद्रप्रयाग। जनपद के गांवों में शायद ही किसी घर में अब कौंणी, चींणा, हरे भट्ट, काले भट्ट, ज्वार, बाजरा मिले। मंडुवा व झंगोरे के साथ बोए जाने वाले इन अनाजों की बुआई अब नहीं हो रही है। जनपद में मंडुवा और झंगोरा के साथ-साथ गेहूं और धान की बुआई का दायरा भी घटा है।



आपदा व जंगली जानवरों की दहशत से गांवों में खेती के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। इससे कृषि योग्य भूमि बंजर हो रही है। फसल चक्र बदलकर भूमि की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।- विजय देवराड़ी, मुख्य कृषि अधिकारी, रुद्रप्रयाग
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