केदारघाटी के फाटा-धार गांव निवासी नवीन सेमवाल ने रंगमंच को नया आयाम देने में अहम भूमिका निभाई। उन्हें मेरी बामणी, बामणी गीत ने उत्तराखंड ही नहीं, देश में भी नई पहचान मिली। कोरोना काल में उन्होंने यू ट्यूब पर छोटी-छोटी लघु फिल्मों के जरिए लोगों को जागरूक करने का काम भी किया।
स्कूली जीवन से रामलीला में अभिनय के शौक ने नवीन सेमवाल को समय के साथ कुशल रंगकर्मी बना दिया था। वह प्रतिभा के धनी तो थे ही, साथ ही जिंदा दिल इंसान भी। उनका व्यवहार ऐसा था कि कोई भी व्यक्ति पहली ही मुलाकात में उनका मुरीद हो जाता था। वर्ष 1990 में रुद्रप्रयाग में अलकनंदा-मंदाकिनी कला संगम से जुड़ने के बाद नगर सहित जनपद में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नवीन सेमवाल बतौर हास्य कलाकार के रूप में अपनी प्रस्तुतियां देने लगे। इसके बाद उन्होंने गीतकार, गायक, नृत्य निर्देशक के रूप में काम करते हुए अपने को समय के साथ मजबूत किया। वर्ष 2018-19 में लोक गायिका हेमा नेगी करासी के साथ उनका गीत मेरी बामणी... बामणी गीत ने उन्हें नई पहचान दी। इस गीत को लेकर खूब विवाद भी हुआ, लेकिन बाद में यह गीत हर घर, हर दुकान और विवाह आयोजन में खूब सुनाई देने लगा। वर्ष 2020 में नवीन सेमवाल ने हेमा नेगी करासी के साथ बामणी-2 गीत भी निकाला, जो लोगों की जुबान पर आज भी है। नवीन सेमवाल ने संजू का बाबा, ओ रे स्वीटी, पांगरी का मेला, गंगाराम, फागुणै फुलार सहित कई गीत गाए। इसके अलावा कोरोना काल में ऑनलाइन पढै़, मंगतु परदेशी, बोंण मा चखल पखल और लॉकडाउन मा कारोबार सहित अन्य कई लघु फिल्में भी बनाईं, जो यू-ट्यूब पर खूब पसंद की गईं। अलकनंदा-मंदाकिनी कला संगम के संस्थापक व शिक्षाविद् जोत सिंह बिष्ट बताते हैं कि नवीन स्कूली जीवन से ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर उत्सुक रहते थे।