पट्टी बच्छणस्यूं के मरगांव निवासी 83 वर्षीय दर्शन लाल चार बेटों के बाबजूद भी भीख मांगकर अपना गुजारा कर रहा है।
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अमर उजाला का स्लोगन ‘बेटी ही बचाएगी’को बच्छणस्यूं पट्टी की एक बेटी चरितार्थ कर रही है। जब चार कमाऊ बेटों ने अपने वृद्ध पिता को दर-दर की ठोकर खाने के लिए विवश कर दिया तो बेटी उनके सहारे की लाठी बनीं।
मुहावरा तो है कि बेटे बुढापे में सहारे की लाठी होता है, लेकिन बच्छणस्यूं पट्टी के एक गांव में वृद्ध पिता के लिए बेटे ‘लाठी’ बन गए हैं। चार बेटों का भरा-पूरा परिवार होने के बाद भी पिता को बुढ़ापे में पानी के गिलास के लिए भटकना पड़ रहा है।
करीब 50 नाली सिंचित भूमि का मालिक होने के बाद भी वह रीते हाथ है। पत्नी की मौत के बाद से वृद्ध अपने बेटों की उपेक्षा का दंश झेल रहा है। हालात यह है कि बीमार होने पर भी उनकी सुध नहीं ली गई। जबकि उनका एक बेटा सरकारी नौकरी में ऊंचे ओहदे पर है।
तीन अन्य बेटों की आमदनी भी अच्छी खासी है। बेटों की ओर से उपेक्षित और बीमार पिता की स्थिति का पता लगने पर बेटी का कलेजा मुंह को आ गया। वह पिता को यह कहकर अपने पास रुद्रप्रयाग ले आई कि वह भी तो उनकी संतान है।
अब बेटी यहां उनका इलाज करवा रही है। वृद्ध का कहना है कि कहने को चार बेटे हैं, लेकिन उन्हें मेरे साथ बैठने तक का समय नहीं है। इलाज करवाना तो दूर की बात है। कहा कि जीवन भर मिस्त्री का काम कर उन्होंने अपने बच्चों को कभी अभावों का आभास तक नहीं होने दिया। खेतीबाड़ी से लेकर सभी जरूरी सुविधाएं जुटाई हैं। जब हमारे (पत्नी और उनके) शरीर ने जवाब देना शुरू किया और तो बच्चों ने भी उपेक्षा शुरू कर दी।
बताया जा रहा है कि वृद्ध को मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन भी आठ माह से नहीं मिली है। उनकी बेटी ने कहा कि बेटे और बेटी का अंतर समाप्त होना चाहिए। बेटियां भी अपने मां-बाप की सेवा कर सकती है। वह कहती है कि वह कोई अहसान नहीं कर रही है। वो तो एक बेटी का फर्ज निभा रही है।