रुद्रप्रयाग। हिमवंत कवि स्व. चंद्रकुंवर बर्त्वाल की कर्मस्थली एवं शरणस्थली रहा पवालियां खंडहर हो चुका है। एक दशक पूर्व तत्कालीन प्रदेश सरकार द्वारा यहां कृषि शोध संस्थान खोलने की घोषणा भी फलीभूत नहीं हो पाई है। परिजनों व समाजसेवियों ने पवालियां का संरक्षण कर स्मारक के रूप में विकसित करने की मांग की है।
चितेरे कवि स्व. बर्त्वाल का वर्ष 1942-43 में जब स्वास्थ्य खराब होने लगा तो वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए प्राचीन इतिहास की पढ़ाई छोड़कर वापस अपने पैतृक गांव आ गए। क्षय रोग की चपेट में आने से उनका स्वास्थ्य दिनोंदिन गिरता जा रहा था। उन्होंने अगस्त्यमुनि में एग्लो इंडियन जूनियर हाईस्कूल का संचालन भी किया, लेकिन तबियत अधिक खराब होने के कारण उनका घर से आना-जाना भी बंद हो गया था। वर्ष 1945 से वह अगस्त्यमुनि के निकट मंदाकिनी नदी के दूसरे किनारे पर पवालियां में बनाए मकान में रहने लगे। यहां बिताए जीवन के अंतिम ढाई वर्षों को उन्होंने हिंदी साहित्य को समर्पित कर दिया। बीमारी के बावजूद प्रतिदिन वे प्रकृति प्रेम से जुड़ी रचनाएं लिखते रहे। उन्होंने करीब 1300 रचनाएं रची। पवालियां में ही हिमवंत कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल ने 14 सितंबर 1947 को अंतिम सांस ली। उनके नाम पर कृषि शोध संस्थान खोलने की घोषणा की गई, लेकिन आज तक यह साकार नहीं हो पाया। चितेरे कवि के भतीजे गंभीर सिंह बर्त्वाल, किशोर न्याय बोर्ड के नरेंद्र सिंह कंडारी सहित भीरी के ग्राम प्रधान व अन्य ने पवालियां को संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग को सौंपने व पूर्व में घोषित कृषि शोध संस्थान की स्थापना की मांग की है।