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ड्रैगन पर वार, स्वेदशी सामान की बाहर

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लक्सर। इस बार दिवाली पर लोग चाइनीज आइटम से दूरी बना रहे हैं और स्वदेशी आइटमों की मांग कर रहे हैं, जिसका असर बाजार में साफ देखने को मिल रहा है। घर सजाने के लिए भी चाइनीज झालरों को लोग अलविदा कहने लगे हैं। ग्राहकों के इस फैसले के बाद शहर में परंपरागत दीयों का कारोबार बढ़ गया है। दीयों की मांग बढ़ने से कुम्हारों के चेहरे भी खिल गए हैं।
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वैसे तो हर साल दीपावली नजदीक आते ही चायनीज सामान की बाजार में ब्रिकी बढ़ जाती थी। हालांकि चायनीज आइटम से दूरी बनाने के लिए सामाजिक संस्थाओं का अभियान जारी रहता था। कुछ लोग जागरूक होकर चायनीज आइटम का बहिष्कार भी करते थे, जबकि अधिकतर घर सजाने के लिए चाइनीज आइटम भी इस्तेमाल करते थे। इस बार कोरोना काल में लोग बुरी तरह से प्र्रताड़ित हुए। ऐसे में लोगों ने शुरू से ही चायनीज आइटमों का बहिष्कार शुरू कर दिया था। अब दीपावली पर ग्राहक रौशनी के लिए चाइनीज झालरों की जगह मिट्टी के दीपक से घरों में रोशन करने में प्राथमिकता दे रहे हैं। वहीं ग्राहकों के मूड को भांपते हुए दुकानदारों ने भी चाइनीज आइटम रखना कम कर दिया। यहीं नहीं बहुत से दुकानदारों ने चाइनीज सामान का बहिष्कार ही कर दिया। कुम्हारों की मानें तो बीते कई साल से मंद पड़े दीयों के कारोबार को इस बार संजीवनी मिली है। कुंभकार पिछले सालों की तुलना में इस बार 25 फीसदी तक बढ़ोत्तरी की उम्मीद कर रहे हैं।
मांग बढ़ी तो बदला स्वरूप
ग्राहकों को लुभाने के लिए मिट्टी के परंपरागत दीयों के साथ डिजाइनर, कलरफुल और आकर्षक शेप वाले दीये भी मिल रहे हैं। कारीगर बबलू प्रजापति, अर्जुन कुमार की मानें तो दीयों के पारंपरिक स्वरूप से स्टाइलिश लुक ग्राहकों को ज्यादा पसंद आ रहा है। आकर्षक डिजाइन की वजह से बच्चे दीयों को खरीदना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। कारीगरों का कहना है कि बीते कुछ सालों में दीयों की खरीदारी औपचारिकता भर रह गई थी। इनकी कीमत पांच रुपये से लेकर सौ रुपये तक रखी है।
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ये हैं खास
बाजार में अभी पंचमुखी, श्रीफल, त्रिमुखी, सातिया दीये अधिक पसंद किए जा रहे हैं। इनके अलावा बड़े दीयों में पांच बत्ती, सात बत्ती और 21 बत्ती के भी उपलब्ध हैं।
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