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नापाक पत्थरों ने बुझा दी चूल्हों की आग और खो दी रोजगार की आस

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यहां हर किसी को दरारों में झांकने की आदत है दरवाजे खोल दो, कोई पूछने भी नहीं आएगा... ये अल्फाज वर्तमान में डाडा जलालपुर के हालात पर सटीक बैठते हैं। बवाल के बाद कई घरों में ताले लटके हैं और लोग उनमें झांककर देखते नजर आ रहे हैं। हालात यह हैं कि दरवाजों पर लटके ताले खोल भी दिए जाएं तो कोई बुझे हुए चूल्हों की आग भी जलाने नहीं आएगा। ये वह चूल्हे हैं जिन पर बनने वाले खाने की खुशबू का स्वाद आसपास के लोग कभी लिया करते थे। अब यह कब जलेंगे इसका जवाब आसपास के उन लोगों के पास भी नहीं है जो इन चूल्हों पर बनने वाले खाने की खुशबू से ही बता देते थे कि आज क्या बन रहा है।
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16 अप्रैल की रात को डाडा जलालपुर गांव में ऐसी घटना घटेगी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। हालात ऐसे बन जाएंगे कि अपने घरों को छोड़कर जाना होगा। वर्तमान के हालात और अतीत की यादों पर नजर डालें तो सबकुछ बदला हुआ है। अतीत में बंद घरों के लोगों ने सपना संजोया था कि गेहूं की कटाई शुरू होगी तो रोजगार के साथ सालभर का अनाज भी जमा हो जाएगा। इस अनाज से रोजाना चूल्हे की आग पर पूरे परिवार के पेट की आग बुझेगी लेकिन उस रात फेंके गए नापाक पत्थरों की वजह से आज इन घरों के आंगन सूने पड़े हैं और घरों पर ताले लटके हैं। अब इसी बात की चिंता है कि कब और कैसे घर वापसी होगी। कब पहले की तरह उन्हें घर में सुकून और गांव में भाईचारे के साथ रहने का मौका मिलेगा।
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