जिले में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की हलचल शुरू होते ही कुछ लोगों ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम को हथियार बना लिया है। इस हथियार से लोग अपने प्रतिद्वंद्वी को चुनाव में पटकनी देने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। ब्लॉक कार्यालय में विभिन्न ग्राम पंचायतों से विकास कार्यों की जानकारी के लिए आवेदन आ रहे हैं। सामान्य तौर पर पहले जहां एक सप्ताह में एक या दो लोग आरटीआई लगाते थे तो वहीं अब यह संख्या बढ़कर आठ से 10 हो गई है। इससे एक तरफ जहां ब्लॉक कर्मचारियों का कामकाज बढ़ गया है तो वहीं निवर्तमान ग्राम प्रधानों के माथे पर शिकन आने लगी है।
जिला निर्वाचन विभाग से लेकर प्रशासन और पंचायत अधिकारी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारियों में लगे हैं। हालांकि, अभी आरक्षण सूची जारी नहीं हुई है। इससे प्रत्याशियों के चेहरे स्पष्ट नहीं पाए है। इसके बावजूद दावेदार विभिन्न माध्यमों से गांव में प्रचार-प्रसार में जुट गए हैं। वहीं, दूसरी ओर अधिकतर ग्राम पंचायतों में प्रतिद्वंद्वियों ने आरटीआई को हथियार बना लिया है। उन्होंने अपने और अन्य ग्रामीणों के माध्यम से ब्लॉक कार्यालय में आरटीआई लगाकर जानकारी मांगनी शुरू कर दी है। लोग विगत पांच वर्षों में गांव हुए विकास कार्यों का ब्योरा मांग रहे हैं। कोई मनरेगा के तहत तालाब की सफाई से संबंधित जानकारी ले रहा है तो कोई पांच साल में गांव में बने शौचालयों के बारे में पूछ रहा है।
करौंदी गांव निवासी एक किसान ने गांव में मनरेगा के तहत बनाए गए पशुबाड़ों और नालियों की जानकारी मांगी है। गुम्मवाला माजरी में एक युवक ने गांव में पांच साल में आए सफाई के बजट से लेकर श्मशान घाट पर आए खर्च की जानकारी मांगी है। अधिकारियों का कहना है कि हर बार चुनाव आते ही अचानक आरटीआई का इस्तेमाल ज्यादा हो जाता है। इससे एक ओर जहां ब्लॉक में चुनाव के साथ ही सूचना का अधिकार के तहत जानकारी देने का कर्मचारियों पर बोझ पड़ जाता है तो वहीं दूसरी ओर इससे चुनाव का कार्य भी प्रभावित होता है। इससे अलग जिन प्रधानों के खिलाफ सूचनाएं मांगी गई हैं, उनमें भी खलबली मच जाती है। बीडीओ शिवप्रसाद थपलियाल का कहना है कि कार्यालय में कुछ समय से आरटीआई के आवेदनों की संख्या बढ़ी है।
अधिकारियों से शिकायत बाजी भी शुरू
चुनाव नजदीक आते ही ग्रामीणों ने ग्राम प्रधानों की शिकायतें भी करनी शुरू कर दी हैं। कुछ लोग गांव में हुए कार्यों में धांधली की शिकायत कर रहे हैं तो कुछ विकास कार्य नहीं होने की। ग्रामीण आरोप लगा रहे हैं कि निवर्तमान ग्राम प्रधानों ने अपने कार्यकाल में केवल चहेते लोगों के यहां काम करवाया है। अब प्रशासक भी निवर्तमान ग्राम प्रधानों के कहने पर चल रहे हैं।