गंगनहर पर निर्माणाधीन पैदल पुल गिरने से तीन मजदूरों की मौत के करीब 14 साल पुराने मामतले में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के तीन अधिकारियों को राहत मिली है। द्वितीय अपर सत्र न्यायालय ने तीनों अधिकारियों की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत की ओर से सुनाई गई सजा को निरस्त कर दिया।
अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी अधिकारियों की लापरवाही और हादसे के लिए उनकी जिम्मेदारी को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसके बाद तीनों अधिकारियों को दोषमुक्त कर दिया गया।
मामला चार फरवरी 2012 का है। रुड़की में नगर पालिका पुल के पास गंगनहर पर पैदल पुल का निर्माण कार्य चल रहा था। इसी दौरान निर्माणाधीन पुल अचानक गंगनहर में गिर गया। हादसे के समय वहां काम कर रहे पांच मजदूर नहर में गिर गए थे। इनमें से दो मजदूरों को बचा लिया गया जबकि तीन मजदूरों जिशान, धीर सिंह और शमीम की डूबने से मौत हो गई थी।
अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका
हादसे के बाद निर्माण कार्य की गुणवत्ता और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे थे। इस मामले में पीडब्ल्यूडी के तत्कालीन तत्कालीन अपर सहायक अभियंता, निर्माण खंड, लोक निर्माण विभाग, रुड़की छब्बील दास, तत्कालीन सहायक अभियंता दीपक और तत्कालीन अधिशासी अभियंता अनिल कुमार के खिलाफ लापरवाही से मौत होने के आरोप में मुकदमा चला था।
न्यायिक मजिस्ट्रेट, रुड़की की अदालत ने 29 सितंबर 2025 को तीनों अधिकारियों को दोषी ठहराते हुए दो-दो साल के कठोर कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ तीनों अधिकारियों ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश आशुतोष कुमार मिश्रा की अदालत ने अपील पर सुनवाई करते हुए मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और जांच से जुड़े तथ्यों का परीक्षण किया।
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अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि हादसा आरोपी अधिकारियों की लापरवाही के कारण ही हुआ था। आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए आरोपों का संदेह से परे साबित होना आवश्यक है लेकिन प्रस्तुत साक्ष्य इस कसौटी पर पर्याप्त नहीं पाए गए।
अदालत ने जांच और विशेषज्ञ रिपोर्ट से संबंधित साक्ष्यों की स्वीकार्यता और उन्हें विधिवत साबित किए जाने के पहलुओं पर भी विचार किया। इसके साथ ही अभियोजन की स्वीकृति से जुड़े कानूनी प्रश्न पर भी गौर किया गया। न्यायालय के अनुसार, मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तीनों अधिकारियों को दोषी ठहराए रखना उचित नहीं था।