उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच, उत्तराखंड सेफ एसोसिएशन, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संयुक्त संघर्ष समिति, अपराध नियंत्रण एवं अनुसंधान संगठन और देवभूमि हिंदू वाहिनी संगठन के संयुक्त तत्वावधान में गढ़वाली व्यंजन की प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतियोगिता में अरविंद नेगी ने अरबी के पत्तों के पत्यूड़ और झंगोरे की खीर बनाकर सबका दिल जीत लिया। स्वादिस्ट पकवान बनाने पर अरविंद ने पहला, रोबिन ने दूसरा और गुड्डी देवी ने तीसरा स्थान प्राप्त किया। इस मौके पर विजेताओं को प्रशस्तिपत्र व पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। इस प्रतियोगिता में स्थानीय स्तर पर 40 महिला व पुरुषों ने प्रतिभाग किया।
नटराज बाईपास मार्ग स्थित गढ़वाल मंडल विकास निगम में आयोजित प्रतियोगिता का अपराध नियंत्रण एवं अनुसंधान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदीप डोबरियाल व महिला संगठन की प्रदेश अध्यक्ष मनीषा वर्मा ने संयुक्त रूप से शुभारंभ किया। इस मौके पर प्रदीप डोबरियाल ने बताया कि प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य गढ़वाल के व्यंजनों को प्रचारित व प्रसारित करना है। पलायन होने के कारण लोग अपनी संस्कृति व खानपान को भूलते जा रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में जो भी अनाज पैदा होता है वह बिना यूरिया के हरी खाद से पैदा होता है। बाहरी प्रदेशों में ज्यादातर अनाज यूरिया खाद से पैदा की जा रही है, जो अनाज की ताकत को कम कर देती है। इस अवसर पर डीएस गुसांई, विकास कुड़ियाल, वेदप्रकाश शर्मा, विक्रम भंडारी, रुकम पोखरियाल, रामेश्वरी चौहान, रिंकी राणा, अमरा बिष्ट आदि मौजूद थे।
प्रतिभागियों ने गढ़वाली व्यंजनों को किया प्रदर्शित
गढ़वाली व्यंजनों की इस प्रतियोगिता में महिलाओं और पुरुषों ने झंगोरे की खीर, मंडुवे की रोटी, लिंगोड़े की सब्जी, चौलाई के पत्तों की कापली, उड़द दाल की पकोड़ी, गहत का फांड़ा, काली दाल का चौसा, तिल की चटनी, अरबी के पत्तों के पत्यूड़, नौरंगी दाल के पराठे, छांच का रैता आदि गढ़वाली व्यंजनों को परोसा गया। इस प्रतियोगिता में सबसे अच्छा गढ़वाली व्यंजन बनाने वाले प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पाने वाली महिलाओं को सम्मानित किया गया।
‘दैणा होया खोली का गणेशा हे’ ने किया मंत्रमुग्ध
कार्यक्रम के दौरान रामेश्वरी चौहान के नेतृत्व में स्थानीय महिला समूह ने गढ़वाली मांगलिक गीत ‘दैणा होया खोली का गणेशा हे’ की प्रस्तुति देकर सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। मांगलिक गीत गायक रामेश्वरी चौहान ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में मांगलिक कार्यों में गाया जाने वाला यह मांगलिक गीत है। पूर्व में यह गीत हर मांगलिक कार्यों में सबसे पहले गाया जाता था जो वर्तमान में विलुप्त के कगार पर है। हम इस मांगलिक गीत को अपने समूह के माध्यम से मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले गढ़वाली परिवारों के मांगलिक कार्यों में जारी रखने का प्रयास कर रहे हैं। मांगलिक गीत में सहयोग के रूप में शकुंतला चौहान, सरोजनी रावत, कमला असवाल, मुनी गुसांई, उषा रावत, उर्मिला कोटनाल अपना योगदान दे रहीं हैं।