ऋषिकेश। जनसहभागिता से ही मानव और गुलदार संघर्ष रुक सकेगा। यह बात वन विभाग के भागीरथी वृत की ओर से लीसा डिपो में आयोजित मानव वन्यजीव संघर्ष, वन पंचायत एवं बर्ड वॉचिंग विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में वन संरक्षक धीरज पांडे ने कही। इस दौरान टिहरी और नरेंद्रनगर वन प्रभाग के वन अधिकारियों और वन रक्षकों को गुलदार के रेस्क्यू के बारे में जानकारी दी गई। मध्य प्रदेश से आए वन्यजीव विशेषज्ञों ने भी अपने अनुभव बताए।
इंदिरानगर स्थित लीसा डिपो आयोजित कार्यशाला के पहले दिन वन विभाग के भागीरथी वृत के टिहरी वन प्रभाग और नरेंद्रनगर वन प्रभाग के क्षेत्र में मानव और गुलदार संघर्ष कम करने के लिए चर्चा की गई। वन संरक्षक धीरज पांडे ने कहा कि मानवीय गतिविधि के कारण ही गुलदार आदमखोर होते हैं। उन्होंने जोशीमठ का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पर नगर पालिका की ओर से एक स्थान पर कूड़ा एकत्रित किया जाता है, भोजन की तलाश से जंगल से 15 भालू कूड़ा मैदान में वन विभाग की टीम को दिखे। लोग मीट का सेवन करने के बाद मीट का अवशेष घरों के आसपास फेंक देते है। गुलदार मीट का अवशेष खाने के लिए आबादी की ओर आ जाता है। जिससे मानव और गुलदार संघर्ष की घटनाएं होती हैं। उन्होंने कहा कि हादसा होने के बाद गुलदार को कैसे ट्रैंकुलाइज करना है, इससे पहले गुलदार के व्यवहार को समझना होगा। डीएफओ नरेंद्रनगर डीएस मीणा ने कहा कि मानव गुलदार संघर्ष कम करने के लिए जनजागरूकता आवश्यक है, इसके लिए वन विभाग के अधिकारियों को गांवों में जाकर गावों के लोगों से समय समय पर संवाद करना होगा। इसके रेंज से लगती ग्राम सभा के लोगों को बल्क मैसेज भेजने के साथ ही गांवों में पोस्टर लगवाने और लाउडस्पीकर से एनाउंसमेंट करने से लोगों में जागरुकता आएगी, इससे भी मानव गुलदार संघर्षों में कमी आएगी।
पोस्टमार्टम में गुलदारों में पेट में मिली पॉलीथिन
ऋषिकेश। वन विभाग के चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर के डॉ. अमित ध्यानी ने बताया कि उन्होंने अब तक जितने भी गुलदारों के पोस्टमार्टम किए हैं, उनसे अधिकांश गुलदारों के पेट में पॉलीथिन मिली। संभवतया इन पॉलीथिन में मीट के अवशेष रहे होंगे। इन पॉलीथिन को खाने के बाद गुलदार के पेट में फंसने गुलदार बीमार हुआ होगा, या फिर गुलदार इन पॉलीथिन के अंदर मिल रहे मीट के अवशेषों के बाद गांव के आसपास ही रहने लग गया होगा। जिससे कई ग्रामीण पर हमला कर दिया होगा।
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पोल्ट्रीफार्म के पास आबादी में आने लगा गुलदार
ऋषिकेश। मणिकनाथ रेंज देवप्रयाग के रेंजर देवेंद्र सिंह पुंडीर ने बताया कि देवप्रयाग क्षेत्र में एक पोल्ट्रीफार्म के पास गुलदार के सक्रिय होने की सूचना के बाद जब वे टीम के साथ मौके पर गए, जानकारी जुटाई तो यह बात सामने आई कि पोल्ट्रीफार्म में जिन मुर्गियों की मौत हो जाती थी, फार्म संचालक उन्हें पोल्ट्रीफार्म से सटी खाई में फेंक देता था। उसके बाद जब पोल्ट्रीफार्म संचालक को ऐसा करने से रोका गया तो गुलदार वहां से अपने आप ही चले गया।
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अग्नि सुरक्षा का प्लान है मानव वन्यजीव संघर्ष का प्लान नहीं
ऋषिकेश। डीएफओ धर्मसिंह मीणा ने बताया कि वन विभाग की ओर से वनों को आग से बचाने के लिए फायर लाइन, वॉचिंग टॉवर, क्रू स्टेशन, अतिरिक्त मैनपावर की व्यवस्था की जाती है, लेकिन मानव वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए विभाग के पास कोई प्लान नहीं है। इसके विभाग को मानव वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए प्लान बनाना होगा।
जहां से गुलदार को उठाया, वहीं पहुंचेगा
ऋषिकेश। वन विभाग के डॉ. अमित ध्यानी गुलदार को यदि गुलदार को किसी स्थान से रेस्क्यू कर दूसरे स्थानों पर छोड़ा जाता है तो गुलदार कुछ दिनों बाद वहीं पहुंच जाता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वन विभाग की ओर से एक गुलदार को नरेंद्रनगर से रेस्क्यू कर रवासन(चिड़ियापुर हरिद्वार) छोड़ा गया था, 10 दिन बाद गुलदार की लोकेशन नरेंद्रनगर में मिली। पथरी से एक गुलदार को रेस्क्यू कर पर्वतीय क्षेत्रों में छोड़ा गया था लेकिन वह भी दिनों बाद वापस पथरी पहुंच गया।
डॉक्टर की सलाह पर ही करें ट्रैंकुलाइज
उज्जैन मध्यप्रदेश से आए वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ.विवेक पगारिया ने कहा कि यदि वनकर्मी गुलदार को ट्रैंकुलाइज कर रहे हों तो डॉक्टर की सलाह पर ही दवाई की मात्रा तय करें। विभागीय टीम के पास सभी संसाधन हों, हाईड्रोलिक वाहन हो। गुलदार की हिस्ट्री पता हो।
कार्यशाला में यह रहे मौजूद
एसडीओ डीपी बलूनी, एसडीओ मनमोहन बिष्ट, रेंजर हर्बल गार्डन बीपी ध्यानी, रेंजर नरेंद्रनगर विवेक जोशी, रेंजर शिवपुरी स्पर्श काला, रेंजर सकलाना बुद्धिप्रकाश, रेंजर कीर्तिनगर अखिलेश भट्ट, अब्बल सिंह, हेमंत बिजल्वाण, राकेश रावत, संजय कुमार, भगत सिंह रावत आदि थे।
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लिसा डिपो में वन विभाग की कार्यशाला में प्रतिभाग करते विभागीय अधिकारी।- फोटो : RISHIKESH