मैं तुम्हें सपने देने आया हूं, बेचने नहीं। यह बात प्रसिद्ध कवि और कथावाचक डॉ. कुमार विश्वास ने सुमित्रानंदन पंत जयंती के अवसर पर लेखक गांव थानो में कही।
उत्तराखंड भाषा संस्थान, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय और लेखक गांव की संयुक्त पहल पर कवि और छायावाद के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत की जयंती के अवसर पर लेखक गांव स्थित नालंदा पुस्तकालय और अटल प्रेक्षागृह में सुमित्रानंदन पंत साहित्य पर्यटन पथ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कुमार विश्वास ने कहा कि लेखक गांव जैसे स्थान कवि की कल्पना को उड़ान देते हैं। यदि किसी को एक कविता लिखनी है तो पहले हजार कविताएं पढ़नी होंगी। उन्होंने युवाओं से मोबाइल पर बिताए जाने वाले समय को सीमित कर साहित्य और पुस्तकों के साथ अधिक समय बिताने का आह्वान किया।
सुमित्रानंदन पंत को स्मरण करते हुए डॉ. विश्वास ने कहा कि उन्होंने अपनी कविताओं में प्रकृति को केवल देखा नहीं, बल्कि जिया है। प्रयाग में रहने के बावजूद उन्होंने अपने भीतर उत्तराखंड हिमालय की आत्मा को सदैव जीवित रखा।
नालंदा पुस्तकालय में प्रथम सत्र में बाल कवियों द्वारा सुमित्रानंदन पंत की कविताओं का भावपूर्ण काव्य पाठ किया गया। द्वितीय सत्र में बच्चों द्वारा लेखक गांव के कुलगीत लेखक गांव हमारा है का सामूहिक गायन हुआ। कार्यक्रम में सुमित्रानंदन पंत साहित्य पर्यटन पथ पर आधारित लघु वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए लेखक गांव के संस्थापक डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि सुमित्रानंदन पंत का साहित्य भारतीय चिंतन, प्रकृति और मानवीय मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है। उनकी रचनाओं में हिमालय की चेतना, प्रकृति की पवित्रता और भारतीय संस्कृति की आत्मा समाहित है। पर्यावरणविद् पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि साहित्य और प्रकृति का संबंध काफी गहरा है। भाषा संस्थान की निदेशक डॉ. मायावती ढकरियाल, डॉ. कमला पंत, डॉ. विद्या सिंह, डॉ. शशांक शुक्ला, संजय महर, पूजा पोखरियाल आदि उपस्थित रहे।