ब्यूरो/अमर उजाला/ऋषिकेश।
नगर निगम की 187 दुकानों से 2014 के शासनादेश के मुताबिक दुकानों से कर वसूली का मामला एक नए मकड़जाल में उलझ गया है। अब निगम प्रशासन का तर्क है कि शासनादेश को बोर्ड बैठक में रखा जाएगा। वहां पारित होने के बाद नई दरें लागू की जाएंगी। बिडंबना यह है कि नगर निगम को वित्तीय क्षति बढ़ती जा रही है और अफसर से लेकर बोर्ड तय नहीं कर पाया है कि शासनादेश को लागू करने का व्यवस्थित तरीका क्या है।
बता दें, निगम की आय बढ़ाने के लिए ऊपरी तौर पर तो बोर्ड से लेकर अफसर तक बेहद गंभीर दिख रहे हैं। अंदरखाने की असलियत यह है कि अपनों को बचाने के लिए सभी जिम्मेदार नियमों से खेल कर रहे हैं। शासनादेश के मुताबिक 187 दुकानों से कर वसूली कैसे लागू की जाए। इस पर पालिका प्रबंधन से लेकर निगम प्रशासन स्पष्ट राय नहीं बना पाया है।
निगम के आर्थिक मोर्चे पर भी राजनीति भारी
बोर्ड बैठकों में कायदापसंदी और नियमों का हवाला देने वाले लोगों की भी कलई खुलने लगी है। गौरतलब है कि पालिका प्रबंधन के दौरान शासनादेश लागू करने के लिए वित्त एवं कर समिति बनी थी। इसमें कई सभासद शामिल थे। तत्कालीन बोर्ड ने कहा था कि समिति अपनी रिपोर्ट बोर्ड में प्रस्तुत करे। हालांकि कर एवं वित्त समिति ने न तो रिपोर्ट प्रस्तुत की न ही शासनादेश को लागू करने की जरूरत महसूस की। इतना ही नहीं अफसरों ने भी बोर्ड का हवाला देकर शासनादेश से पल्ला झाड़ लिया।
तीन चरणों में अध्ययन हुआ, नतीजा सिफर
शासनादेश के मुताबिक कर वसूली और आय बढ़ाने की प्रक्रिया अध्ययन के फेर में उलझ गई है। करीब दो महीने से दुकानों की फाइल का अध्ययन हो रहा है। इसके तहत पहले तो क्लर्क स्तर पर मंथन कर दस्तावेज तैयार किए गए। इसके बाद मुख्य नगर आयुक्त ने खुद पड़ताल की। अब सहायक नगर आयुक्त अध्ययन कर रहे हैं। करीब दो महीने की कसरत के बाद नतीजा ये निकला है कि शासनादेश बोर्ड बैठक में रखा जाएगा। इसके बाद आगे की कार्रवाई होगी।
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पालिका प्रबंधन के दौरान शासनादेश लागू करने के लिए कर एवं वित्त समिति बनाई गई थी जिस अपनी रिपोर्ट देनी थी। उक्त रिपोर्ट आई नहीं लिहाजा शासनादेश लागू नहीं हो पाया। अब शासनादेश को निगम की बोर्ड बैठक में रखा जाएगा। वहां से पारित होने के बाद लागू होगा।
-उत्तम सिंह नेगी, सहायक नगर आयुक्त