उच्च हिमालयी क्षेत्र में बसा धारचूला का बोन गांव।
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प्रदेश का पहला सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र (कम्यूनिटी रिजर्व) धारचूला की दारमा घाटी के बौन गांव को बनाया जा रहा है। यह देश का 46 सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र होगा। इस संरक्षित क्षेत्र के अस्तित्व में आने पर स्थानीय बौन गांव के लोग वन संसाधनों के संरक्षण में सक्रिय रूप से शामिल हो सकेेंगे। गांव के लोग ही तय करेंगे कि वन उपज का किस तरह से और कितना उपयोग किया जाए। दारमा घाटी का यह गांव दुर्लभ जड़ी बूटियों, कस्तूरा सहित अन्य वन्य जीवों और बुग्यालों के लिए जाना जाता है।
प्रभागीय वन अधिकारी डॉ. विनय भार्गव के मुताबिक बौन को सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र बनाने के लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है। बौन गांव वालों से भी सहमति ले ली गई है। अस्तित्व में आने के बाद यह देश का 46वां और उत्तराखंड का पहला कम्यूनिटी रिजर्व होगा। सिक्योर हिमालय परियोजना के तहत यह कम्यूनिटी रिजर्व बनाया जा रहा है।
भारतीय वन्य जीव संस्थान की परियोजना वैज्ञानिक डॉ. परिवा डोबरियाल के मुताबिक उत्तराखंड में अब तक कोई सामुदायिक रिजर्व नहीं है। बौन गांव कम्यूनिटी रिजर्व बनने से विश्व मानचित्र पर आएगा। वन्यजीव संस्थान की डॉ. उपमा मनराल ने बताया कि कम्यूनिटी रिजर्व से क्षेत्र के लोगों की आजीविका बढ़ेगी और उन्हें वनों से होने वाले अन्य फायदे भी मिलेंगे। यह वन संपदा के संरक्षण व विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में भी सहायक होगा। शुक्रवार को कार्यशाला में गांव के लोगों को कम्यूनिटी रिजर्व की जानकारी भी दी गई।
सबसे अधिक मेघालय में हैं सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र
देश का पहला सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र 2003 में मेघालय में ही बनाया गया था। इसके बाद 2007 में कर्नाटक में सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। 3.12 वर्ग किलोमीटर के इस क्षेत्र को पक्षियों की विविधता के लिए जाना जाता है। इसके बाद से पूरे देश में 45 सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र घोषित किए जा चुके हैं। इस तरह के सबसे अधिक क्षेत्र मेघालय में हैं। वहां करीब 40 वर्ग किलोमीटर में 41 सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र घोषित किए जा चुके हैं। इसके अलावा पंजाब में दो, केरल में एक सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र हैं।