पिथौरागढ़ शहर का दृश्य। संवाद
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छह दशक पहले 24 फरवरी 1960 को अलग जिला बना पिथौरागढ़ आज 60 साल का हो गया। इन 60 सालों में कई गांवों ने नगर का रूप ले लिया, लेकिन ग्रामीणों की तकदीर आज भी नहीं बदली है। बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं का विस्तार न होने से गांवों से पलायन हो रहा है।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली जिलों का गठन 1960 को किया गया। चीन और नेपाल की सीमा से सटे पिथौरागढ़ जिले को वीर भूमि के रूप में जाना जाता है। सेना में प्रतिनिधित्व के मामले में पिथौरागढ़ जिला दूसरे स्थान पर है। जिला गठन के साथ ही सीमांत जिले में तमाम गतिविधियां बढ़ीं, पर जिला गठन के बाद जिस विकास की उम्मीद थी, वह 60 साल बाद भी पूरी नहीं हुई है। आज भी जिले की 50 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को बेहतर यातायात सुविधा नहीं मिल पाई है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का अभाव है। जिन स्कूलों में कभी छात्र संख्या 800 से 1200 होती थी, वहां अब केवल 100 से डेढ़ सौ छात्र अध्ययनरत हैं।
करोड़ों की योजनाएं बनाने के बावजूद लोगों को पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है। आज भी लोग नौले-धारों से जलापूर्ति कर रहे हैं। पिथौरागढ़ शहर में सीवर लाइन की सुविधा लोगों को नहीं मिल पाई है। शहर की नालियों में सीवर बह रहा है। अधिकतर सड़कें बदहाल हैं। लोगों को जान जोखिम में डालकर आवागमन करना पड़ता है। सीमांत जिले से शुरू हुई हवाई सेवा भी नियमित न होने से लोगों को खास लाभ नहीं दे पा रही है।