कभी पत्थर की स्लेटों के लिए कुमाऊं, गढ़वाल में विख्यात 200 साल पुराना कनालीछीना कस्बा असुविधाओं की जकड़न में है। वन अधिनियम के कारण स्लेट उद्योग बंद हो गया। लोगों की आजीविका पर इसका असर पड़ा तो मार कनालीछीना के बाजार पर भी पड़ी। समस्याओं, दिक्कतों से दो-चार कनालीछीना कस्बे का व्यापार बढ़ने के स्थान पर घट रहा है। सड़क चौड़ीकरण के काम के कारण कनालीछीना कस्बा खतरे से घिर गया है सो अलग।
90 के दशक तक कनालीछीना कस्बा लोगों की आवाजाही से गुलजार रहता था। ग्रामीण इलाकों में सड़कें नहीं थीं तो कनालीछीना ही आसपास के क्षेत्रों का मुख्य बाजार हुआ करता था। कनालीछीना के पाली, रतोली, सिरोली, सतगड़ में पहाड़ी सैली के मकानों की छतों पर लगने वाली पत्थर के स्लेट की खानें थीं। इन खानों से 200 मजदूरों को रोजगार मिलता था। कुमाऊं, गढ़वाल से स्लेट के खरीदार कनालीछीना पहुंचते थे। वन अधिनियम के कारण वर्ष 1990 के बाद स्लेट निकालने के काम में प्रतिबंध लगा तो कनालीछीना के लोगों के आर्थिक तरक्की के रास्ते में बड़ी रुकावट पैदा हो गई। सैकड़ों लोगों का रोजगार छिन गया, कनालीछीना के बाजार पर भी इसका असर पड़ा।
90 के दशक के बाद ग्रामीण क्षेत्र के लिए सड़कें बनने लगी, रोड पहुंची तो गांवों में दुकानें खुलने लगी, रोजमर्रा का सामान गांव में मिलने से ग्रामीणों की कनालीछीना कस्बे पर निर्भरता खत्म हो गई। विकासखंड का दर्जा पहले से था, हाल में तहसील का दर्जा भी कनालीछीना को मिला, लेकिन ढलान वाले स्थान पर बसा कनालीछीना कस्बा अपना आकार नहीं बढ़ा पाया। विस्तार के लिए जगह न होने के कारण कनालीछीना में नए भवन नहीं बन पाए। आज भी पुराने मकान ही सौ से अधिक दुकानों वाले कनालीछीना कस्बे में देखे जा सकते हैं। पानी की कमी भी कस्बे के विकास में बाधक है।
अन्य दिक्कतों की बात करें तो कस्बे में कई सालों से व्यवसाय कर रहेे एवं वहां रह रहे लोगों के लिए सड़क चौड़ीकरण का काम जी का जंजाल बन गया है। बीआरओ ने सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ी जबरदस्त ढंग से काट दी, जिस कारण सड़क के ऊपरी हिस्से में स्थित पहाड़ी घास, पेड़ों से विहीन हो गई है। पहाड़ी दरकती रहती है, जिससे कई दुकानों और टैक्सी स्टैंड के लिए हर समय खतरा है।
विकासखंड कार्यालय और तहसील कार्यालय के कामों के लिए आने वाले लोगों की आवाजाही पर ही कनालीछीना कस्बे की रौनक निर्भर रह गई है। आवास की उचित सुविधा न होने के कारण सरकारी कर्मचारी, अधिकारी भी यहां निवास नहीं करते। 26 किमी दूर जिला मुख्यालय में कमरा लेकर अप-डाउन करते हैं। यानि कि बाजार को सरकारी कर्मचारी, अधिकारियों का भी लाभ नहीं मिल रहा। कुछ साल पूर्व कनालीछीना में खुले पालीटेक्निक कालेज के कारण लोगों के मकान किराए में अवश्य लगने लगे हैं। सुविधाओं का विकास हो तो पंचोला और भुटुवा (बकरी का कच्चा-पका मांस) के लिए प्रसिद्ध कनालीछीना कस्बे में भी विकास की रेस में शामिल होने का माद्दा है।
स्लेट प्रतिबंध का असर
कनालीछीना में पाई जानी वाली पत्थर की स्लेटों पर प्रतिबंध का असर कहीं न कहीं पहाड़ी शैली के मकानों के निर्माण पर पड़ा है। अब पहाड़ पर एक भी पहाड़ी शैली का मकान नहीं बन रहा है। 94 वर्षीय बुजुर्ग मथुरा दत्त जोशी कहते हैं कि सरकार पहाड़ी शैली के मकानों को संरक्षित करने की बात कर रही है, यदि वैज्ञानिक तरीके से पत्थर की स्लेटों की निकासी का रास्ता तैयार किया जाता तो एक बार फिर पहाड़ी शैली के मकानों के निर्माण की ओर लोगों का रुझान बढ़ता।
टैक्स वसूलने के बाद भी नहीं दी जाती सुविधा
कनालीछीना व्यापार मंडल महासचिव दीपक भंडारी कहते हैं कि कस्बे में निकास नालियों की तक सुविधा नहीं है। सड़क धूलभरी होने से दुकानों का सामान खराब होता है। खाद्य पदार्थ प्रदूषित होते हैं। सफाई की व्यवस्था न होने से सुलभ शौचालय बंद पड़ा है। महिलाओं को भारी दिक्कत होती है। यात्री भी कनालीछीना में रुकना नहीं चाहते। हर साल टैक्स वसूलने के बावजूद जिला पंचायत भी बाजार को कोई सुविधा नहीं देती।