थल (पिथौरागढ़)। पहाड़ मूलभूत सुविधाएं पटरी पर नहीं आ पा रही हैं। यहां बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं लोगों की जान पर भारी पड़ रही हैं। कभी मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते और कभी समय पर डॉक्टर के न पहुंचने पर मरीज की जान चली जाती है। ऐसा ही एक मामला रविवार को थल में सामने आया जहां समय पर चिकित्सक और स्टाफ के नहीं मिलने से एक बुजुर्ग की सांसों की डोर टूट गई। इसके बाद अस्पताल में परिजनों ने हंगामा किया लेकिन गई हुई जान फिर कहां लौटती... और परिवार के सदस्य शव लेकर घर चले गए।
थल के पतेत गांव के हरीश चंद (65) का स्वास्थ्य रविवार सुबह अचानक बिगड़ गया। उन्हें सांस लेने में बहुत ज्यादा तकलीफ हो रही थी। उनकी तबीयत बिगड़ती देख परिजन उन्हें निजी वाहन से लेकर सुबह करीब 8:30 बजे अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गोचर पहुंचे। यहां बुजुर्ग एक-एक सांस के लिए तड़पते रहे लेकिन परिजनों के मुताबिक उस समय अस्पताल में न डॉक्टर मिला और न ही कोई स्टाफ का कर्मचारी।
कुछ समय बाद आखिर डॉक्टर अस्पताल में पहुंचे लेकिन तब तक हरीश चंद की सांसें उनके दिल का साथ छोड़ चुकी थीं। मृतक के परिजनों का आरोप है कि उन्होंने अस्पताल स्टाफ के लिए 15 मिनट तक इंतजार किया और मरीज तड़पता रहा। अगर स्टाफ वहां मौजूद होता और समय से ऑक्सीजन दिया गया होता तो उनकी जान बचाई जा सकती थी। परिजनों ने स्वास्थ्य कर्मियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए काफी देर तक अस्पताल में हंगामा किया। बाद में गुस्सा शांत हुआ तो शव लेकर घर चले गए।
डिग्रेड होने के बाद से रेफरल केंद्र बनकर रह गया है अस्पताल
क्षेत्र के लोगों का कहना कि आठ साल पूर्व सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गोचर को डिग्रेड कर अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र की श्रेणी में ला दिया था, तब से यह अस्पताल केवल रेफरल केंद्र बनकर रह गया है। पिछले 30 साल से थल क्षेत्र के ग्रामीण इस अस्पताल का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में उच्चीकरण करने की मांग कर रहे है। इसके लिए विभाग स्तर पर यहां के जनप्रतिनिधियों का प्रस्ताव तीन साल पहले स्वास्थ्य निदेशालय को भेजा गया था लेकिन वह प्रस्ताव किसी फाइल में शायद दम तोड़ चुका है।
कोट
सुबह 8.36 बजे मरीज के परिजन का फोन आया था। 8:40 बजे सिस्टर और 8:42 बजे मैं स्वयं अस्पताल में पहुंच गया था। मरीज की अस्पताल पहुंचने से पहले ही सांसें टूट चुकी थीं। - डॉ. करन रोमाल, चिकित्साधिकारी अति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गोचर
समय पर इलाज न मिलने का नया नहीं है मामला
किसी भी मरीज की जान बचाने के लिए जरूरी है कि उसे समय पर इलाज मिल सके लेकिन पहाड़ पर कई बार मरीज इसी समय से हार जाता है और उसे अपनी जान गंवानी पड़ जाती है। अभी हाल के दिनों में वृद्धा और उसकी नातिन की तबीयत जंगली मशरूम खाने से बिगड़ गई थी। इस मामले में भी परिजनों का आरोप था कि दोनों को समय रहते हायर सेंटर रेफर नहीं किया गया जिस कारण उनकी जान चली गई। परिजनों का कहना था कि यदि समय रहते ही दोनों को हायर सेंटर रेफर कर दिया गया होता तो शायद आज दोनों जिंदा होते।