पिथौरागढ़। नेपाल की सीमा पर काली नदी किनारे लगने वाले जौलजीबी मेले में अब पहले जैसी रौनक नहीं दिखती है। अब मेले में व्यापार भी सीमित हो गया है। आधुनिकता और शहरीकरण की मार भी मेले पर पड़ी है।
जौलजीबी मेला पहले काफी समृद्ध था। वर्ष 1962 तक मेले में कई व्यापारी उन्नत नस्ल की भेड़ का ऊन, सुहागा, नमक, जड़ीबूटियां, चंवर गाय की पूंछ, छिरबी आदि लेकर तिब्बत से आते थे। वह व्यापारी यहां से अनाज, तंबाकू, गुड़, बर्तन, तेल, सूती कपड़ा आदि ले जाते थे। बाद में वहां के कारोबारियों का आना बंद हो गया। नेपाल के दूरस्थ क्षेत्रों के व्यापारी घी, शहद, रिंगाल के डोके, मोस्टे, कृषि संबंधी उपकरण लाते थे। मेले में दन, चुटका, थुलमा, पंखी, कालीन आदि खूब बिकते थे। नेपाल के मैदानी क्षेत्र के प्रसिद्ध हुमला-जुमला के घोड़े बिक्री के लिए लंबे समय तक आते रहे।
पीलीभीत, रामपुर, बरेली समेत कुमाऊं के अमीर लोग भी इन्हें खरीदते थे। इसलिए मेले में हजारों लोग उमड़ते थे। रात को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तिब्बत-नेपाल और भारत तीनों देशों की सांस्कृतिक झलक दिखती थी।
बैड़ा के बुजुर्ग पुरुषोत्तम उपाध्याय, ऊंचाकोट के वासुदेव जोशी और अस्कोट के राजेंद्र पाल बताते हैं कि पहले मेले के लिए खासा उत्साह रहता था। मेले में जाने के लिए एक माह पहले से तैयारी शुरू हो जाती थी। वह बताते हैं कि जौलजीबी मेले में भी आधुनिकता की मार पड़ी है। पहले गांव भरे थे। अब गांवों से अधिकतर लोगों ने शहरों की ओर पलायन कर लिया है। इस कारण भी मेले की रौनक फीकी पड़ी है।
.........इनसेट..........
नेपाल में भी तीन दिन में ही सिमट गया मेला
पिथौरागढ़। जौलजीबी मेले के दौरान ही नेपाल में भी मेला लगता है। भारत के मेला क्षेत्र में आने वाले मेलार्थी सामान खरीदने के लिए नेपाल भी जाते थे। इस बार नेपाल में केवल तीन दिन ही मेला लगा जबकि पिछले वर्षों तक वहां एक सप्ताह तक मेला लगता था। इस बार कम मेलार्थियों के आने से नेपाल में भी मेला फीका हो गया है। संवाद