वार्षिक पूजा में नृत्य करते श्रद्धालु
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सीमांत के जनजाति गांवों में एक पखवाड़े तक चली विशेष पूजा का समापन हो गया है। सावन में लोग महर्षि वेद व्यास की विशेष पूजा करते हैं। इसके अलावा अन्य देवी-देवताओं की उपासना भी इसी महीने होती है। मान्यता है कि सावन में 33 कोटि देवता कैलास पर्वत में भगवान शंकर के दर्शनों को जाते हैं। यहां से निकलते समय यह देवता ह्या नमज्युंग लोकदेवता देवता से अनुमति प्राप्त कर आगे कैलास की ओर जाते हैं।
लोगों की प्राचीन मान्यता रही है कि सावन में कई देवी-देवता हिमालयी गांवों में रहते हैं, इसलिए सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए शुक्ल पक्ष के पूरे 15 दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के दौरान दर्च्यो (समृद्धि का प्रतीक खंभा) एवं प्रसाद के रूप में दलंग, पूड़ी, प्रसाद का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। नृत्य और संगीत के साथ भजन-कीर्तन से देवताओं की स्तुति की जाती है। सीमांत के बूंदी, गर्ब्यांग, गुंजी, नपलच्यू, नाबी, रौंगकांग, कुटी गांवों में व्यांस देव की पूजा-अर्चना की गई तथा नाच गाकर व्यांस देव की स्तुति की गई। वार्षिक पूजा के इस कार्यक्रम में देश के अन्य शहरों में काम करने वाले लोग अनिवार्य रूप से पहुंचने का प्रयास करते हैं। इस बार हेलीकॉप्टर सेवा से लोगों को आने जाने में काफी राहत मिली।