रं लिपि बनकर तैयार हो गई है। इसे अंतिम परीक्षण के बाद मान्यता देने की तैयारियां चल रही हैं। रं लिपि बनाने के लिए 1980 में गठित श्रीनंदन न्यास की बैठक रविवार को स्थानीय रं संग्रहालय में हुई।
बैठक की अध्यक्षता करते हुए नंदन न्यास के अध्यक्ष अशोक नबियाल ने कहा कई दशकों से दारमा, चौदांस और व्यांस घाटी में प्रचलित रं बोली के तकनीकी पक्षों को ध्यान में रखते हुए रं लिपि का सर्वमान्य रूप लगभग तैयार हो गया है।
इसे रं युवा मक्कर सिंह गर्ब्याल ने तैयार किया है। मक्कर सिंह 2004 से रं बोली के स्वर और व्यंजनों के विस्तार और प्रचार-प्रसार में लगे हैं। श्री नबियाल ने जानकारी दी कि क्षेत्र के प्रसिद्ध समाजसेवी नन्दराम लाला ने वर्ष 1980 में रं बोली को मौलिक रूप में संरक्षित करने के उद्देश्य से रं लिपि बनाने वाले व्यक्ति को एक लाख रुपये इनाम में देने की घोषणा की थी।
न्यास के संस्थापक अध्यक्ष स्व. जवाहर नबियाल ने कई प्रयास भी किए। कई अन्य लोगों ने इस दिशा में पहल की। नंदन न्यास ने मक्कर सिंह की बनाई लिपि को अंतिम रूप देने का निर्णय लिया है।
बैठक में कहा गया कि मार्च से रं लिपि के प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाएंगे। रं बोली में कई शब्द ऐसे हैं जिनका उच्चारण अलग स्वर में है जिसको रं लिपि के बिना पढ़ा जाना संभव ही नहीं है, इसीलिए रं बोली को मूल रूप में संरक्षित करने के लिए रं लिपि बेहद जरूरी हो गई थी।
बैठक में कई सुझाव भी आए। तय हुआ कि अब नंदन न्यास रं बोली के संरक्षण, विकास एवं प्रचार-प्रसार पर और ज्यादा तेजी लाकर रं लिपि को अस्तित्व में लाने का प्रयास करेगा।
बैठक में महिमन ह्यांकी, दीवान पतियाल, राजेंद्र रौंकली, हनुमान नबियाल, जसराज व्यांस, जीवन रौंकली, विरेंद्र नपलच्याल, कुसुम गर्ब्याल, भागेश्वरी गर्ब्याल, बिशनी देवी, लक्ष्मी रायपा, सरिता कुटियाल, चैंत सिंह, चमक सिंह तिंकरी, मक्कर सिंह, विजय गर्ब्याल, दीवान गुंज्याल, देवकी देवी सहित कई लोग उपस्थित थे।
सरकार ने रं बोली को पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला लिया है। डीडीहाट डायट को पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। रं बोली की लिपि बन जाने पर पाठ्यक्रम में शामिल करने में आसानी होगी।