धारचूला तहसील के व्यास घाटी के 7 गांव और दारमा घाटी के 14 गांवों के लोग शीतकालीन प्रवास से अपने मूल गांवों को लौटने लगे हैं। यह लोग अगले छह महीने (अक्तूबर) तक अपने मूल गांवों में रहेंगे।
व्यास घाटी के 7 गांव बूंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, गुंजी, नाभी, रोंगकांग, कुटि गांव के लोग शनिवार को घोड़े, खच्चर, याक और अन्य जानवरों के साथ माइग्रेशन पर मूल गांवों को निकल गए। यह लोग तवाघाट, पांगला, लखनपुर, नजंग, बोलायर धार की 4 किमी की कठिन चढ़ाई, उतराई पार कर मालपा, लामारी, बूंदी और छियालेक के 14 किमी के खतरनाक रास्ते से होते हुए चार से पांच दिनों में अपने गांव पहुंचेंगे। भारत-चीन सीमा के अंतिम गांव कुटि निवासी कुंवर सिंह कुटियाल ने बताया कि आपदा ग्रस्त इलाकों से जान हथेली में रखकर जानवरों के साथ गांव जाना पड़ता है। बूंदी निवासी देवेश रायपा ने बताया कि माइग्रेशन और चीन को सामान ले जाने के दौरान बारिश होने पर उन लोगों को गुफाओं, चट्टानों में अथवा टैंटों में रहना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जब तक सड़क का निर्माण पूरी तरह नहीं हो जाता है, तब तक रास्तों में टिनशेड बनाने चाहिए।
दारमा घाटी के सेला, चल, नागलिंग, बालिंग, दुग्तू, सौन, दांतू, बौन, फिलम, गो, ढांकर, तिदांग, मारछा, सीपू के लोग भी माइग्रेशन से अपने मूल गांवों को निकल गए हैं। इन छह महीनों के दौरान इन लोगों की आमदनी का साधन कृषि के साथ ही कैलाश मानसरोवर, छोटा कैलाश और ओम पर्वत यात्रा के साथ ही भारत-चीन व्यापार है।