थल के गोचर में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत दो वर्ष पहले 2.37 करोड़ रुपये की लागत से बनी मंडी का अब तक कोई उपयोग नहीं हुआ है। मंडी की स्थापना के समय कहा गया था कि ऊपरी रामगंगा घाटी में पैदा होने वाले फल और सब्जियों को उचित बाजार उपलब्ध कराने तथा उत्पादकों को सही लाभ देने में यह मंडी कारगर साबित होगी। मंडी के लिए जो भवन बनाया गया है, उसमें उत्पादों को रखने के लिए बड़ा गोदाम भी तैयार है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
बताया गया कि दो वर्ष पहले मंडी भवन का निर्माण करने के बाद उत्तराखंड कृषि उत्पादन एवं विपणन बोर्ड के अधिकारी देखने तक के लिए यहां नहीं आए। लोगों को अब तक यह भी मालूम नहीं है कि मंडी का संचालन कौन करेगा और किसानों को इसके लिए क्या करना होगा। ऊपरी रामगंगा घाटी में आम, अमरूद, केला, नाशपाती जैसे फलों के अलावा लौकी, कद्दू, शिमला मिर्च, बैंगन, गोभी, राई, पालक का बहुत उत्पादन होता है। उत्पादक इन फलों और सब्जियों को औने-पौने दाम पर स्थानीय बाजार में बेच आते हैं। मंडी की स्थापना होते समय लोगों को उम्मीद थी कि शायद इसका क्षेत्र के किसानों को लाभ मिलेगा, लेकिन अब तक मंडी की कोई गतिविधि शुरू न होने से लोग मायूस हैं।
इस मामले में तहसीलदार रघुवीर सिंह का कहना है कि मंडी के भवन का निर्माण मंडी परिषद ने किया है और सभी स्थानों पर मंडी परिषद ही इनका संचालन करती है। मंडी परिषद के अधिकारियों से इसे चालू करने के संबंध में बात की जाएगी।
भवन का उपयोग न हुआ तो आंदोलन होगा
स्थानीय निवासी महिराज भैंसोड़ा का कहना है कि करोड़ों की लागत वाले मंडी भवन का उपयोग न करना सरकारी धन का दुरुपयोग है। वह कहते हैं कि जब मंडी भवन का निर्माण कर दिया गया है तो उसका उपयोग भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंडी में कामकाज शीघ्र शुरू न होने पर लोग आंदोलन करेंगे।
मंडी चालू करने की सोचे नई सरकार
स्थानीय निवासी दीपक भैंसोड़ा का कहना है कि किसानों को दो साल पहले जो उम्मीद थी वह अब समाप्त होने लगी है। वह कहते हैं कि यदि पिछली सरकार इस मंडी को शुरू नहीं कर पाई तो नई सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए। किसानों की आय बढ़ेगी तो पलायन पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।