पिथौरागढ़ डाक अधीक्षक के अधीन कुल 364 ग्रामीण डाकघर आते हैं। इन डाकघरों में डाक विभाग की सभी योजनाओं को लागू कराने की जिम्मेदारी रहती है। उनको भी बचत खाता, मनीआर्डर, डाक वितरण, सुकन्या योजना, जनधन योजना के खातों का लक्ष्य दिया जाता है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर इन डाकघरों में कुछ भी नहीं है।
पोस्टमास्टर के लिए शर्त यह है कि वह या तो डाकघर को अपने घर पर खोलेगा या फिर डाकघर चलाने के लिए खुद भवन की व्यवस्था करेगा। किसी भी भवन का किराया नहीं दिया जाता।
ग्रामीण डाकघरों में स्टाफ की भारी कमी है, जिन डाकघरों के लिए डाक का थैला बसों या अन्य वाहनों से आता है। वहां पर मात्र दो लोगों का स्टाफ रहता है।
एक पोस्टमास्टर और एक पोस्टमैन, यदि डाक का थैला पैदल ले जाना हो तो वहां पर एक डाक रनर की तैनाती की जाती है। पोस्टमास्टर के लिए बाध्यता है कि उसे रोज पोस्टआफिस खोलना है। शाम को भेजी जाने वाली डाक का थैला तैयार करना होता है। दिन के समय बचत खातों और मनीआर्डर का काम निपटाना पड़ता है।
अब बात ग्रामीण डाकघरों में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन की आती है। इन कर्मचारियों को छह से 12 हजार रुपये प्रतिमाह भुगतान होता है। ग्रामीण डाक कर्मचारी दावा करते हैं कि डाक विभाग की असली रीढ़ वही हैं।
व्यवसाय को बढ़ाने में ग्रामीण डाकघरों की भूमिका अहम होती है। सुविधाओं के नाम पर हमेशा झूठा आश्वासन दिए जाने से कर्मचारी कई बार आंदोलन का रास्ता भी अपना चुके हैं।
अखिल भारतीय ग्रामीण डाकसेवक संघ के परिमंडलीय सचिव कैलाश कापड़ी ने बताया कि सरकार ने ग्रामीण डाकसेवकों को सातवें वेतन आयोग के दायरे में लेने से इनकार किया है।
ग्रामीण डाकसेवकों के वेतन पुनरीक्षण के लिए अधिकारी स्तर की समिति बनाई जा रही है। यह समिति जैसी सिफारिश करेगी ग्रामीण डाकसेवकों का वेतन उसी के अनुसार बढ़ेगा। वह इसे कर्मचारियों के साथ घोर अन्याय करार देते हैं।
अखिल भारतीय ग्रामीण डाकसेवक संघ के परिमंडलीय सचिव कैलाश कापड़ी ने कहा कि उपेक्षा से क्षुब्ध ग्रामीण डाकसेवक 10 दिसंबर को एक बार फिर मुख्य डाकघर के सामने धरना देंगे।
उन्होंने कहा कि सरकार ग्रामीण डाकसेवकों के किसी भी मसले को हल नहीं कर रही है। रोजाना सात से आठ घंटे ड्यूटी करने के बाद भी कोई सुविधा नहीं दी जा रही है। ग्रामीण डाकसेवक अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।