पिथौरागढ़ का ऐतिहासिक मेथोडिस्ट चर्च
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सीमांत जिले पिथौरागढ़ में ईसाई मिशनरी की गतिविधियां 1870 से शुरू हो गई थी। तब जॉन हेनरी बडन और उनके पुत्र हैंसन बडन ने यहां का दौरा किया था। बडन ने यहां पर मिशन केंद्र की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान समझा था। पिथौरागढ़ से तिब्बत और नेपाल को रास्ते जाते हैं। जॉन हेनरी बडन ने अमेरिकी मेथोडिस्ट एपिस्कोपल मिशन के जेएम थॉबर्न से मिशन केंद्र खोलने की पेशकश की थी। थॉबर्न ने इस पेशकश को स्वीकार किया और डॉ. रिचर्डसन ग्रे को 1873 में अमेरिका से पिथौरागढ़ भेजा। 1879 में यहां सिल्थाम में मेथोडिस्ट चर्च की स्थापना हो गई। कई बार मरम्मत और विस्तार के बाद आज यहां पर भव्य चर्च है।
पहले यहां पर छोटा सा गिरजाघर और अस्पताल था। 1931 तक इस छोटे गिरजाघर का दो बार विस्तार हुआ। यहां के लोग मिशनरी की गतिविधि शुरू होने से उत्साहित थे। उसी दौरान यहां पर बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय शुरू हुआ। इस विद्यालय में पढ़कर कई बालिकाएं बाद में उच्च शिक्षा के लिए अल्मोड़ा गई। 1884 में डॉ. रिचर्डसन ग्रे अमेरिका चले गए और यहां का सारा मिशनरी का काम ऐनी बडन ने संभाला। ऐनी ने भाटकोट में अपना आवास बनाया। 1885 में यहां पर लेप्रोसी मिशन की स्थापना हुई। 1909 कर इस कुष्ठ रोग अस्पताल में 70 मरीज भर्ती हो गए थे। 1903 में लूसी डब्लू सुलीवान ने यहां पर शिक्षा का काम संभाला और ऐनी बडन ने धर्म प्रचार की जिम्मेदारी संभाली। 1910 में बडन ने चंपावत में भी एक मिशन केंद्र की स्थापना की थी।
मिशनरी के इस दौर में पहाड़ पर शिक्षा का बेहद प्रसार हुआ। ईसाई समाज के बुद्धिजीवी विमलदीप फिलिप ने बताया कि अल्मोड़ा का रैमजे इंटर कॉलेज, एडम्स कन्या इंटर कॉलेज, पिथौरागढ़ का एलडब्लूएस कन्या इंटर कॉलेज और मिशन इंटर कॉलेज ईसाई मिशनरीज की ही देन हैं। आज भी यह शिक्षण संस्थान बड़ा नाम कमा रहे हैं। यह बात अलग है कि बाद में लेप्रोसी मिशन बंद हो गया था।
24 को चर्च में प्रार्थना सभा होगी
क्रिसमस के मौके पर 24 दिसंबर को अपरान्ह चार बजे से सिल्थाम स्थित मेथोडिस्ट चर्च में विशेष प्रार्थना होगी। 25 दिसंबर को सुबह 11 बजे विशेष प्रार्थना सभा होगी। इसमें अन्य धर्मों के लोग भी शामिल होंगे। ईसाई समाज के लोग क्रिसमस की तैयारी में जुट गए हैं। पिथौरागढ़ में ईसाई समुदाय के 125 परिवार हैं और इनकी कुल आबादी 600 है। जिले के जगतड़, बजेटी, दाड़िमखोला, बेड़ीनाग और धारचूला में भी ईसाई समाज के कुछ परिवार रहते हैं।