आस्था, विश्वास और रोमांच का प्रतीक हिलजात्रा पर्व नजदीक है। युवा, बुजुर्ग इसकी तैयारी में जुट गए हैं। कुमौड़ के साथ ही सतगढ़, देवलथल, खतीगांव, सिरोली सहित विभिन्न हिस्सों में मनाया जाने वाला हिलजात्रा पर्व जिले में विशिष्ट पहचान रखता जो आस्था से जुड़ा मुखौटा नृत्य शैली का उदाहरण है। मुखौटों के साथ मनाए जाने वाले इस उत्सव में लोक जीवन के साथ आस्था और हास्य का भी समावेश मिलता है। लखिया भूत, महाकाली, हिरण, शिव बारात, और बैलों की जोड़ी हिलाजात्रा पर्व का मुख्य आकर्षण रहते हैं। बड़ी संख्या में इन क्षेत्रों में पहुंचकर लोग अद्भुत कलाकारी के दीदार करते हैं। हिलजात्रा में स्वांग रचने के लिए मुखौटे सजने लगे हैं।
लखिया भूत के आगमन पर होता है हिलजात्रा का समापन
इस पर्व पर बैल, हिरण, चीतल और लखिया भूत जैसे दर्जनों पात्र मुखौटों के साथ मैदान में उतरकर दर्शकों को रोमांचित करते हैं। लखिया भूत के आगमन के साथ हिलजात्रा पर्व का समापन होता है। भगवान शिव का गण लखिया भूत लोगों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देता है।
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सतगढ़ गांव के हिरन और महाकाली को मिली प्रसिद्धि
र्वतीय प्रदेश में हिलजात्रा पर्व सिर्फ सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में मनाया जाता है जो अपने आप में विशिष्ट है। यही कारण है कि इस पर्व को यूनोस्को की धरोहर में शामिल करने की कवायद शुरू हुई है। संस्कृति विभाग इसे यूनेस्को की धरोहर में शामिल करने के लिए पर्व की डाक्यूमेंट्री तैयार कर इसका प्रस्ताव भेजेगा। कुमौड़, सतगढ़, खतीगांव, देवलथल सहित अन्य हिस्सों में पहुंचकर संस्कृति विभाग की टीम डाक्यूमेंट्री तैयार करेगी।
पिथौरागढ़ की हिलजात्रा की डाक्यूमेंट्री तैयार होगी। इसे यूनेस्को की धरोहर में शामिल करने की योजना है। निश्चित तौर पर पिथौरागढ़ की हिलजात्रा विशिष्ट है।