कई देशों ने समुद्र में शहर बसा लिए गए हैं। ऐसी भी तकनीक है जिससे कुछ ही घंटों में 100 मीटर तक लंबे बेली ब्रिज तैयार कर उसके ऊपर से भारी भरकर वाहन गुजरने लगते हैं लेकिन पिथौरागढ़ जिले के बंगापानी क्षेत्र के कई गांव ऐसे हैं जहां के लिए न रास्ते और न ही पुल हैं। इन गांवों की हजारों की आबादी की जिंदगी आधुनिक विज्ञान की नहीं बल्कि आदम के जमाने की तकनीक के सहारे चलती है।
इसी तहसील के ढुना-मानी गांव को जाने वाला रास्ता दो साल पूर्व आपदा के दौरान गोरी नदी में समा गया था, तब से इस गांव तक जाने के लिए रास्ता नहीं बन पाया है। जरूरी कामकाज के लिए फगुवा या फिर बंगापानी आने वाले यहां के लोग लकड़ी की सीढ़ी के सहारे पहाड़ी चढ़कर गांव तक पहुंचते हैं।
यह इतना खतरनाक है कि थोड़ा सा संतुलन बिगड़ा तो सीधे उफनाई गोरी नदी में गिरने का खतरा रहता है, लेकिन मजबूरी के कारण जान जोखिम में डालकर आवाजाही करना इस गांव के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गया है, क्योंकि गांव तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को मदकोट होकर जाना पड़ता है जिसमें छह किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।
स्थानीय कैलाश सिंह, चंद्र शेखर, महेंद्र सिंह, दुर्गा सिंह ने बताया कि रास्ता न बनने से तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बच्चों, महिलाओं या बुजुर्गों के लिए इस रास्ते चल पाना मुश्किल होता है। यही हाल वर्ष 2020 की आपदा में बरबाद हुए टांगा गांव का भी है। आपदा में 11 लोगों को खोने वाले इस गांव तक जाने के लिए भी पुल नहीं है। आज भी लोग जंग लगी ट्रॉली के सहारे गांव तक पहुंचते हैं।