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दुदबोली के संरक्षण के लिए चार वर्षों से पत्रिका निकाल रही हैं सरस्वती

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सरस्वती कोहली। - फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण हाशिए पर जा रही मातृभाषा (दुदबोली) के संरक्षण में सीमांत के साहित्यकार भी जुटे हैं। सरस्वती कोहली पिछले चार वर्षों से कुमाऊंनी भाषा को बचाने के लिए आदलि कुशलि नाम से मासिक पत्रिका निकाल रही हैं।
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सीमांत जिले में रं समाज को छोड़कर शेष स्थानों पर कुमाऊंनी भाषा ही मातृभाषा (दुदबोली) है। पिथौरागढ़ के छह पट्टी सोर में कुमाऊंनी की उपबोली सोरियाली बोली जाती है। नगरीय क्षेत्रों से बाहर गांवों के परिवेश में बच्चे पहले दुदबोली को ही समझ पाते हैं।
कुमाऊंनी भाषा पूरी तरह से हिंदी से मिलती-जुलती होने के कारण स्कूल में अक्षर ज्ञान करने तक इन बच्चों की हिंदी भी साफ हो जाती है। इसलिए गांवों के बच्चे कुमाऊंनी और हिंदी दो भाषाओं को अच्छी तरह से समझ और बोल सकते हैं, लेकिन गांवों के नगर में बदलने के बाद पिछले दो-तीन दशकों में नई पीढ़ी ने अपने बच्चों को दुदबोली के बजाय हिंदी और अंग्रेजी भाषा पर ही अधिक जोर दिया।
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इसी कारण बच्चे कुमाऊंनी से दूर हो गए और दुदबोली पूरी तरह से हाशिए पर जाने के कगार पर पहुंच गई। ऐसे में कुछ साहित्यकारों ने कुमाऊंनी भाषा का प्रचार-प्रसार किया। अब कुमाऊंनी बोली को प्राथमिकता मिलने लगी है। ऐसे परिवारों के बच्चे हिंदी और अंग्रेजी के साथ ही कुमाऊंनी भाषा भी बोल और समझ पा रहे हैं।
मासिक पत्रिका आदलि कुशलि की प्रकाशक सरस्वती कहती हैं कि अपनी संस्कृति की तरह बोली भी प्रमुख विरासत है। इस विरासत के संरक्षण के प्रयास सभी को करने होंगे। जिले के कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती जन्नू दा, दिनेश भट्ट, डॉ. पीतांबर अवस्थी, पद्मा दत्त पंत, युवा कवि ललित शौर्य भी कुमाऊंनी भाषा में पढ़, लिख रहे हैं। (ब्यूरो)
अपनी दुदबोली में होते हैं प्राकृतिक भाव
पिथौरागढ़। वरिष्ठ पत्रकार बद्री दत्त कसनियाल का कहना है कि लोगों के भीतर के प्राकृतिक भाव दुदबोली में होते हैं। अपनी मातृभाषा को सशक्त करना है तो लोगों को अपनी संस्कृति, परंपरा, दैनिक संघर्ष और चुनौतियों से लेकर हर कार्य की अभिव्यक्ति नई पीढ़ी के साथ दुदबोली में ही करनी होगी।
जो भाषाएं आगे बढ़ी हैं उन्होंने दैनिक जीवन के संघर्षों को अपनी भाषा में अभिव्यक्ति दी है। हमारी भाषा के पिछड़ने का कारण यह है कि हम उन भावों को हिंदी में ढूंढ़ते हैं और इसके बाद बच्चों को सिखाते हैं, जबकि पहले दुदबोली का उपयोग किया जाना चाहिए। हर नए भाव को भी बच्चों को दुदबोली में बताने का प्रयास करना होगा, तभी मातृभाषा समृद्ध होगी।
अपनी बोली को बचाने के लिए भाषा को लिपिबद्ध कर रहा रं समाज
पिथौरागढ़। धारचूला निवासी रं समाज के लोग अपनी भाषा को बचाने के लिए जुटे हैं। एक साल में रं भाषा को लिपिबद्ध करने का काम पूरा हो जाएगा। नंदन न्यास के अध्यक्ष कृष्णा गर्ब्याल ने बताया कि नंदन न्यास रं लिपि को विकसित कर रही है।
इस कार्य में आठ लोग जुटे हैं। चार कार्यशालाएं हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में भाषा को लिपिबद्ध करने का काम प्रभावित हुआ है। उन्होंने बताया कि अगले एक साल में रं लिपि में पुस्तक प्रकाशित हो जाएगी।
उनका कहना है कि रं समाज में होने वाले विभिन्न संस्कारों, विवाह आदि में रं भाषा का प्रयोग आवश्यक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रं समाज की अपनी बोली को बचाने की मुहिम को सराह चुके हैं।
पिछले साल प्रधानमंत्री ने अपनी मन की बात में धारचूला के रं समाज का जिक्र किया था। प्रधानमंत्री ने अपनी बोली-भाषा को बचाने के लिए रं समाज के प्रयासों की जमकर तारीफ की थी और इसे पूरी दुनिया को राह दिखाने वाली पहल बताया था।
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