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17 वर्ष में बन पाई मात्र पांच किमी सड़क

Wed, 30 Aug 2017 10:41 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, धारचूला
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तिब्बत सीमा तक बन रही सड़क के हाल - फोटो : अमर उजाला
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तिब्बत सीमा पर लिपुलेख तक बन रही सड़क का निर्माण तेजी से करने के लिए प्रदेश के कई मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों ने आदेश जारी किए, लेकिन सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। हद तो तब हो गई कि गर्बाधार से आगे पांच किलोमीटर सड़क काटने में बीआरओ को 17 साल लग गए। अब भी यह पता नहीं है कि सड़क का निर्माण कब पूरा होगा। बीआरओ के स्थानीय अधिकारी इस मामले में कुछ भी बोलने से बचते हैं और इसे महानिदेशालय स्तर का मामला बताकर टाल देते हैं।
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पहले इस सड़क के निर्माण की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग को दी गई थी। 1991 में इस सड़क का नाम टनकपुर-लिपुलेख एनएच रखा गया और निर्माण की जिम्मेदारी बीआरओ को दी गई। बीआरओ ने गर्ग एंड गर्ग कंपनी को सड़क निर्माण का ठेका दे दिया। इस सड़क के निर्माण में तेजी लाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, बीसी खंडूरी, हरीश रावत के अलावा पूर्व मुख्य सचिव आरएस टोलिया और एनएस नपलच्याल भी बीआरओ महानिदेशक से वार्ता कर चुके हैं। बीआरओ ने वर्ष 2000 में गर्बाधार से आगे सड़क निर्माण का काम शुरू किया, लेकिन इन 17 वर्षों में वह पांच किलोमीटर से ज्यादा सड़क तैयार नहीं कर पाया है।

ऐसे में यह सड़क कब पूरी होगी, कहा नहीं जा सकता। बूंदी से छियालेख तक 3 किमी सड़क अभी नहीं बनी है। गर्ब्यांग से आगे नाभीढांग तक 32 किमी मोटरमार्ग तैयार है, लेकिन इसका कोई फायदा इसलिए नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि धारचूला की तरफ लखनपुर, मालपा, बूंदी, छियालेख, लमारी और नजंग तक 28 किलोमीटर सड़क बननी शेष है। ऐसे में बीच के हिस्से पर बनाई गई सड़क का फायदा न तो सुरक्षा बलों को मिल पा रहा है और न कैलाश मानसरोवर यात्रियों को ही राहत मिल रही है। फिलहाल सड़क निर्माणाधीन है और कब पूरी होगी कहा नहीं जा सकता।
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मालपा हादसे के समय सड़क संपर्क न होने से दिक्कत
मालपा में 14 अगस्त को आई आपदा के समय सड़क संपर्क न होने से राहत दलों को पहुंचने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मालपा में 1998 में भी आपदा आई थी, लेकिन इतने वर्षों में मालपा तक सड़क संपर्क बहाल करने की दिशा में कोई पहल नहीं हुई। सबसे बड़ी बाधा संचार संपर्क न होने से भी पैदा हुई। खुद केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा ने स्वीकार किया कि यदि संचार तंत्र विकसित होता तो सूचनाएं एकत्र करने में आसानी होती। टम्टा ने एक वर्ष पूर्व यह ऐलान किया था कि सीमा क्षेत्र में मोबाइल टावर लगाकर लोगों को संचार की सुविधा दी जाएगी, लेकिन अब तक वंचित इलाकों में एक भी टावर नहीं लगा।
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