इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि राजकीय इंटर कालेज प्रेमनगर में हाईस्कूल की कक्षाओं में कला का अध्यापक गणित पढ़ा रहा है और इंटर कक्षाओं में हिंदी विषय पढ़ाने की जिम्मेदारी व्यायाम शिक्षक ने संभाल रखी है। वर्ष 2014 में जब प्रेमनगर में इंटर कालेज को मंजूरी मिली तो उस समय पूरे इलाके में खुशी की लहर थी, लेकिन यह खुशी तब काफूर हो गई, जबकि इंटर स्तर पर न तो शिक्षकों के पद सृजित किए और न तैनाती ही की।
अब जिम्मेदारी हाईस्कूल पढ़ा रहे शिक्षकों पर आ गई। हाईस्कूल में शिक्षकों के सात पद सृजित हैं, लेकिन चार कार्यरत हैं। इनमें से एक शिक्षक किशन सिंह कार्की के पास प्रधानाचार्य का पदभार भी है। वह प्रधानाचार्य के साथ ही इंटर के बच्चों को समाजशास्त्र भी पढ़ाते हैं। 250 की छात्रसंख्या वाले इस विद्यालय को देखकर यही लगता है कि प्रदेश में सरकारी शिक्षा को गर्त में डालने वाला सबसे अच्छा नमूना यहीं पर है। गरीबों के बच्चों के लिए मजबूरी है कि वह अन्यत्र नहीं जा सकते। इंटर में जब कला संवर्ग के विषयों के लिए शिक्षक तैनात नहीं हो पाए तो विज्ञान की बात सोचना बेमानी होगी।
जीआईसी क्यों खोला समझ नहीं आता
प्रेमनगर निवासी अर्जुन रावत का कहना है कि सरकार ने प्रेमनगर में जीआईसी क्यों खोला, समझ नहीं आता। यह तो गरीब बच्चों के साथ अन्याय है। जब शिक्षक तैनात नहीं किए गए तो फिर विद्यालय खोलने का तुक क्या है। विद्यालय तब खोला जाए जब पदों का सृजन हो।
आंदोलन करने से भी क्या फायदा
क्षेत्र पंचायत सदस्य गौरा देवी कहती हैं कि यदि आंदोलन करें भी तो क्या गारंटी है कि शिक्षक मिल जाएंगे। सरकार और नेताओं को खुद ही सोचना चाहिए कि आखिर इतनी अव्यवस्था में बच्चे कैसे पढ़ेंगे। देश का भविष्य कैसे तैयार होगा। स्कूल खोलने के बाद शिक्षक न भेजना तो बड़ा षड्यंत्र है।