मुनस्यारी की बुग्यालों में बर्ड वाचिंग के लिए गए बच्चों को ऐसा लगा जैसे वह किसी नई दुनिया में आ गए हैं। अब तक वह जिन पक्षियों के बारे में किताबों में थोड़ा बहुत पढ़ पाए थे, आज उन पक्षियों को करीब से देखने का अवसर मिल गया। इन बुग्यालों में दुर्लभ प्रजाति की पक्षियों की चहचहाट हमेशा सुनने को मिलती है। कुछ पक्षी काफी दूर तक उड़ते हैं तो कुछ कम उड़ान भरते हैं। पक्षियों को देखकर बच्चों को आभास हुआ कि यह अलग तरह की दुनिया है। यहां लोगों का कोलाहल नहीं है। सिर्फ पक्षियों के कंठ से निकलने वाला संगीत ही खामोशी को तोड़ता है।
मुनस्यारी के बुग्यालों में दो दिन से बर्ड वाचिंग कर रहे बच्चों को ऐसे पक्षी देखने को मिले, जिनका अब तक नाम तक नहीं सुना है। इन बुग्यालों में अब तक बच्चों को व्हाइट थरोटेड, लाफिंग थ्रश, कालिज फीजेंट, ब्ल्यू मैगपाई, विंटर रेन, रोज फिंच, कॉल टिट, ग्रेट टिट, वुडपैकर, फ्लाईकैचर जैसे दुर्लभ पक्षी नजर आए हैं। मोनाल के दर्शन अभी नहीं हुए हैं।
मोनाल संस्था से जुड़े बर्ड वाचर सुरेंद्र पंवार ने पक्षियों के बारे में नई पीढ़ी को जानकारी देने के लिए पहली बार इतने बड़े स्तर का बर्ड वाचिंग कैंप शुरू किया है। खलियाटॉप और थामरीकुंड तक बच्चे घूम आए हैं। अब अगले चरण में मैसरकुंड घूमने जाएंगे। बर्ड वाचर पंवार ने बताया कि इस कैंप का मकसद सिर्फ पक्षियों को देखना नहीं है। इनके स्वभाव, उड़ने की क्षमता, भोजन की तलाश, लोगों को देखकर भागना या नजदीक आना आदि सभी बताया जा रहा है। श्री पंवार के साथ बृजेश धर्मशक्तू, पुष्कर और दीपक पंवार भी बच्चों को पक्षियों के स्वभाव के बारे में बता रहे हैं। कैंप में विभिन्न विद्यालयों के 30 बच्चे भाग ले रहे हैं। हर ग्रुप को दो दो दिन तक बर्ड वाचिंग कराई जाएगी। कुछ दिन तक यह कैंप चलता रहेगा।
जनवरी में हुई थी बड़े स्तर की बर्ड वाचिंग
मोनाल संस्था ने एक जनवरी से पूरे एक सप्ताह तक खलियाटॉप, बेटुलीधार, थामरीकुंड, मैसरकुंड में देसी और विदेशी बर्ड वाचरों की मौजूदगी में पक्षियों की खोजबीन की थी। तब टीम को स्नो कॉक और मोनाल जैसे दुर्लभ पक्षी नजर आए। बर्ड वाचर सुरेंद्र पंवार ने बताया कि हर मौसम में अलग तरह के पक्षी दिखते हैं। इस समय वसंत ऋतु है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में कई प्रकार के पक्षी नजर आते हैं।