पिथौरागढ़। अनाम की ओर से यहां राजकीय संग्रहालय में मंचित फसक नाटक ने दर्शकों को झकझोरा। पहाड़ों में आज भी फसक (निरर्थक गप्प) मारने वाले बहुत मिल जाते हैं। फसक मारने से आदमी की क्षमता नहीं बढ़ती। यह समय बिताने भर का साधन है। ज्यादा फसक मारने वाले को फसक्या कहते हैं।
नाटक के निर्देशक डा. एहसान बख्श ने बताया कि नाटक की कहानी एक पतरौल (वन रक्षक) सुनाता है। यह कहानी डीडीहाट के भागीचौरा गांव के फसक्या दीपू पर केंद्रित होती है, जो नारायणनगर विद्यालय में शिक्षा पूरी करने के बाद गांव में ही रहने लगता है। वह अपने गांव के जंगल, पेड़, जमीन से बेहद प्यार करता है।
दीपू का फौजी पिता चाहता है कि वह शहर में जाकर नौकरी करे पर दीपू अपने गांव को बचाने के लिए हर संघर्ष के लिए तैयार रहता है। दीपू को पता चलता है कि कुछ लोग ऐसे स्थान पर फैक्ट्री लगाना चाहते हैं जहां से पंचाचूली की चोटी दिखती है। उसे पता है कि फैक्ट्री लगने पर जंगल, पेड़ सब नष्ट हो जाएगा। तब दीपू फैक्ट्री नहीं लगने देने का फैसला लेता है आखिरकार फसक्या दीप अपने मिशन में कामयाब हो जाता है।
दीपू फसक्या की भूमिका मनीष कसनियाल ने बखूबी निभाई। इसके अलावा रोहित पुनेड़ा, राम सिंह, नीरज कोठारी, राजीव पांडे, आबसार बख्श, नरेंद्र सिंह सौन, अनूप सामंत, संतोष जोशी, अभिषेक बोहरा समेत कई कलाकारों की अदाकारी बेहतरीन थी। डाइलॉग डिलेवरी ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। निर्देशक डा. एहसान ने कहा कि लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है। संचालन हरीश ग्वाल और महेंद्र सिंह महर ने किया।