लंबे समय से बारिश और बर्फबारी न होने के कारण साफ रहने वाले हिमालयी क्षेत्र के वातावरण में भी गहरी धुंध छा गई है। स्थिति यह है कि धुंध छाने से हिमालय पर्वत श्रंखलाएं नजरों से ओझल हो गईं हैं। बारिश और बर्फबारी न होने के लिए मौसम विज्ञानी पश्चिमी विक्षोभ की निष्क्रियता और अलनीनो को जिम्मेदार बता रहे हैं।
एक दशक पूर्व तक नवंबर से उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फबारी शुरू हो जाती थी। निचले इलाकों में रुक-रुककर या लगातार कई दिनों तक बारिश होती रहती थी। दिसंबर-जनवरी में पूरा हिमालय क्षेत्र बर्फ से लकदक और साफ नजर आता था। अब मौसम का यह क्रम बदल गया है। पिछले पांच वर्षों से मौसम में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नवंबर में हल्का हिमपात और हल्की बारिश के बाद सूखे जैसे हालात पैदा हो रहे हैं। इस साल भी पिथौरागढ़ जिले की दारमा और व्यास घाटियों के साथ ही अन्य ऊंचाई वाले इलाकों में नवंबर की शुरुआत में हल्का हिमपात हुआ था। इसके बाद सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं।
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हिमालय की चोटियों से बर्फ गायब होती जा रही है। बर्फ पिघलने से अधिकांश हिमालयी क्षेत्र काला नजर आ रहा है। बारिश नहीं होने और हिमालय के निकट के जंगलों में आग लगने की घटनाओं से अब धुंध भी गहराती जा रही है।
पश्चिमी विक्षोभ की निष्क्रियता और अलनीनो प्रभाव के कारण मौसम में बदलाव देखने को मिल रहा है। नमी वाली हवाओं के यहां तक नहीं पहुंच पाने से सूखे जैसे हालात हैं। बारिश न होने से वातावरण में धूल के कण जमा हो जाते हैं। इससे धुंध छा जाती है। बारिश के बाद ही धुंध छंट सकती है।
-डॉ.चेतन भट्ट, मौसम विज्ञानी।