30 जून 2016 को बस्तड़ी में आई आपदा में कई जानें बच सकती थी, अगर वहां स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर कार्यरत होता। आपदा में घायल एक व्यक्ति ने इलाज न मिलने के कारण दम तोड़ दिया था। आपदा को एक साल पूरा होने जा रहा है, लेकिन अस्पताल में अब भी डॉक्टर तैनात नहीं हो पाया।
वर्ष 1978 में बस्तड़ी के पास राजकीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिंगाली की स्थापना की गई थी। तब से वर्ष 2000 तक अस्पताल में लगातार डॉक्टर रहे। राज्य बनने के बाद करीब छह-सात वर्षों तक भी डॉक्टरों की कमी नहीं थी, लेकिन विगत दस सालों से इस अस्पताल में कोई भी डॉक्टर नहीं है। हालांकि, इस बीच एक महिला डॉक्टर की दो-तीन महीने के लिए तैनाती हुई थी, वह भी छह माह पहले यहां से ट्रांसफर कर जा चुकी हैं। इस समय अस्पताल में सप्ताह में तीन दिनों के लिए एकमात्र फार्मेसिस्ट आकर लोगों के स्वास्थ्य की जांच करता है। रोजाना अस्पताल को खोलने और बंद करने का काम वार्डब्याय करता है।
आपदा के दौरान गंभीर रूप से घायल रवींद्र भट्ट की मौत इसी कारण हुई थी कि उनको समय पर इलाज नहीं मिल पाया। यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पूरे क्षेत्र की सात हजार की आबादी को चिकित्सा सुविधा देने के लिए खोला गया था, लेकिन दस साल से बिना डॉक्टर के संचालित हो रहे इस अस्पताल में लोगों को कैसी सुविधा मिलती होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यह अस्पताल अभी पंचायत घर में चल रहा है। इसका भवन तैयार है। वहीं, मुख्य चिकित्साधिकारी डा. उषा गुंज्याल का कहना है कि जिले में डॉक्टरों के कई पद रिक्त हैं। इसकी जानकारी निदेशालय को दी गई है। उन्होंने कहा कि यदि जल्दी डॉक्टरों की तैनाती होगी तो सबसे पहले सिंगाली अस्पताल में डॉक्टर भेजा जाएगा।
बिना डॉक्टर के अस्पताल न खोलें
बस्तड़ी निवासी शंकर दत्त भट्ट का कहना है कि जब सरकार डॉक्टरों की तैनाती नहीं कर पाती तो अस्पतालों को नहीं खोला जाना चाहिए। ऐसा करने से आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा। लोग अपनी व्यवस्था से इलाज के लिए कहीं भी चले जाते।
सरकार ने कोई सबक नहीं लिया
बस्तड़ी के सरपंच नंदा बल्लभ भट्ट का कहना है कि पिछले साल की आपदा के बाद भी सरकार ने सबक नहीं लिया है, जबकि आपदा के तुरंत बाद यहां पहुंचे अधिकारियों और नेताओं ने ऐलान किया था कि सिंगाली अस्पताल में सारे स्टाफ की तैनाती कर दी जाएगी।