दारमा घाटी के 14 गांवों, व्यास घाटी के बूंदी और गर्ब्यांग तथा नेपाल के छांगरू और तिंकर गांवों में गबला पूजा की धूम शुरू हो गई है। गबला को भगवान गणेश के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय लोग इस लोकदेवता को ह्या गबला स्यंगसै के नाम से जानते हैं। गबला पूजन के साथ ही रं संस्कृति का नया वर्ष शुरू हो जाता है।
गबला पूजा के समय लोग गांव में सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होते हैं। भगवान गबला के लिए हर घर से पूजा सामग्री और पकवान बनकर आते हैं। चार दिन तक चलने वाली पूजा के दौरान लोग पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचते हैं। इस पूजा प्रक्रिया में किसी प्रकार का वैदिक अनुष्ठान नहीं होता। जनजाति समाज के लोग अपने तरीके पारंपरिक पूजा करते हैं। शाम के समय रोज बर्तनों को बजाया जाता है ताकि गबला देव संतुष्ट हो जाएं। गबला पूजा के यह कार्यक्रम 18 फरवरी तक चलेंगे। रोज हर गांव के लोग अपने गांव के सार्वजनिक स्थान पर स्थित पेड़ की टहनी पर एक एक ध्वजा बांधते हैं।एक ध्वजा को घर लाया जाता है। इसे घर की छत पर टांग दिया जाता है। गबला पूजन के समय सभी लोग पहुंचने का प्रयास करते हैं।
बूंदी गांव निवासी और लघु जल विद्युत निगम के उपमहाप्रबंधक जीएस बुदियाल ने फोन पर बताया कि इस बार गबला पूजन के समय ज्यादा उल्लास दिखाई दिया। भारी संख्या में लोग गांव पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि रं समाज के लोग देश के किसी कोने में नौकरी कर रहे हों लेकिन अपनी संस्कृति की जड़ों को बचाए रखने का प्रयास करते हैं। यह एकता ऐसे आयोजनों के समय दिख जाती है।