थल के सत्यालगांव में सूखी नहर और सूखे खेत
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कफलगाड़ से सत्यालगांव के लिए बनी सिंचाई नहर की मरम्मत पांच साल बाद भी नहीं हो पाई है। यह नहर वर्ष 2012 में आपदा के समय टूट गई थी। गांव के किसान इस नहर की मरम्मत करने की मांग करते-करते थक गए हैं, लेकिन विभाग सुनने को तैयार नहीं है। नहर बंद होने का सबसे बड़ा असर गेहूं और मसूर की फसल पर पड़ रहा है। 50 हेक्टेयर जमीन पर इस बार बोई गई गेहूं की फसल चौपट हो गई है। पिछले पांच वर्षों में इस गांव में गेहूं का उत्पादन 50 से 70 फीसदी तक गिरा है।
गांव के लोगों ने बताया कि नहर का पानी बंद होने का असर सब्जी उत्पादन पर भी पड़ रहा है। धान की फसल के लिए तो बारिश का पानी मिल जाता है, लेकिन गेहूं के लिए बारिश और नहर के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता है। लोगों ने बताया कि नहर बंद होने का मामला कई बार क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत की बैठकों में भी उठाया जा चुका है। विभाग के अधिकारी हर बार सिर्फ आश्वासन देकर टाल देते हैं।
आपदा से नहर के मुख्य स्रोत पर बनी टंकी टूट गई है और नहर भी कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त है। इसी नहर से डुंगरीगांव के कुछ हिस्से पर भी सिंचाई होती है, वहां भी गेहूं की फसल चौपट होने लगी है। गेहूं के बीज कई स्थानों पर उगे नहीं हैं और जहां पर उगे हैं, वहां उनकी वृद्धि रुक गई है। इधर, लघु सिंचाई विभाग के अवर अभियंता केडी कांडपाल ने बताया कि इस नहर के लिए प्रधानमंत्री सिंचाई योजना से धन की मांग की गई है, लेकिन अब तक धन मंजूर नहीं हो पाया है।
नहर की मरम्मत न होना बेहद दुखद
सत्यालगांव निवासी देवराज सत्याल का कहना है कि पांच साल से एक नहर की मरम्मत न होना बेहद दुखद है। ऐसी हालत में सरकार किस तरह कृषि उत्पादन बढ़ाने का दावा करेगी। वह कहते हैं कि पहाड़ पर सभी जगह सिंचाई योजनाओं का यही हाल है। जो नहर टूट गई तो उसकी मरम्मत नहीं हो पाती।
विभाग को करनी पड़ेगी भरपाई
सत्यालगांव निवासी सुनील सत्याल का कहना है कि अब किसान इस लापरवाही के खिलाफ आंदोलन करेंगे और नुकसान की भरपाई के लिए सरकार पर दबाव बनाएंगे। उन्होंने कहा कि पांच साल में नहर की मरम्मत न कर पाने वाले विभाग की जरूरत ही क्या है। किसानों को हो रहे नुकसान की भरपाई विभाग को करनी होगी।