बेस अस्पताल की लिफ्ट करीब 20 दिन से खराब पड़ी है। ऐसे में डायलिसिस कराने आने वाले मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा। तीमारदार स्टाफ या अन्य लोगाें की सहायता से मरीजों को बमुश्किल तीसरी मंजिल तक पहुंचाया जा रहा है। अस्पताल प्रबंधन जल्द ही लिफ्ट को ठीक कराने की बात कह रहा है।
लिंठ्यूड़ा स्थित बेस अस्पताल में हंस फाउंडेशन की डायलिसिस की सात यूनिट स्थापित की गई हैं। इस कारण मरीजों को अब डायलिसिस के लिए हल्द्वानी या बरेली की दौड़ नहीं लगानी पड़ रही है। पिथौरागढ़ में इस समय लगभग 40 मरीज किडनी फेल होने की समस्या से जूझ रहे हैं। यहां पर जिले के करीब 12 मरीजों की हर रोज डायलिसिस की जाती है।
डायलिसिस वाले मरीज को रैंप से व्हील चेयर से या फिर लिफ्ट से यूनिट तक पहुंचाया जाता है। पिछले कुछ समय से लिफ्ट खराब होने के कारण मरीज बड़ी मुश्किल से सीढि़यां चढ़कर यूनिट तक पहुंच रहे हैं। इससे मरीजों के साथ ही तीमारदाराें को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस संबंध में मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ.अजय आर्या ने बताया कि कंपनी को लिफ्ट ठीक कराने के लिए पत्र लिखा गया है। जल्द ही लिफ्ट ठीक करा ली जाएगी।
डायलिसिस कराने के लिए मां को बेस अस्पताल ले जाता हूं। लिफ्ट खराब होने के कारण काफी दिक्कत आ रही है। डायलिसिस यूनिट तक पहुंचने के लिए तीसरी मंजिल तक पैदल ही ले जाना पड़ रहा है। डायलिसिस के कारण पहले से ही मरीज कमजोर हो जाता है। सीढ़ी से चढ़कर जाना मरीज के लिए आसान नहीं है। - आलोक, तीमारदार, पिथौरागढ़।
डायलिसिस के लिए बरेली और हल्द्वानी की दौड़ तो नहीं लगानी पड़ रही है लेकिन पिछले कुछ समय से लिफ्ट खराब होने के कारण तीसरी मंजिल पर स्थापित डायलिसिस यूनिट तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो रहा है। शीघ्र लिफ्ट का सुधार किया जाना चाहिए।
- सुरेश, तीमारदार, थल।
12 हजार लोगों के इलाज का जिम्मा एक डॉक्टर पर
िथौरागढ़। राजकीय ऐलोपैथिक अस्पताल देवलथल का संचालन एकमात्र चिकित्सक के भरोसे हो रहा है। अस्पताल में जांच की भी कोई सुविधा नहीं है। अस्पताल में देवलथल समेत आसपास के गांवों के करीब 12 हजार लोग इलाज कराने आते हैं लेकिन डॉक्टर नहीं होने से मरीजों को जिला अस्पताल जाना पड़ता है।
जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर देवलथल क्षेत्र में खोला गया अस्पताल आज भी सुविधाओं से वंचित है। अस्पताल में राज्य बनने से पहले दो चिकित्सक, फार्मासिस्ट, वार्ड बॉय समेत अन्य पद पर कर्मचारी कार्यरत थे। राज्य बनने के बाद लोगों को उम्मीद भी कि अस्पताल का उच्चीकरण कर सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी लेकिन हालात और खराब हो गए।
वर्तमान में अस्पताल में एकमात्र चिकित्सक कार्यरत हैं। अल्ट्रासाउंड, एक्सरे तो दूर यहां खून जांच की सुविधा तक नहीं है। आपात स्थिति में मरीजों को इलाज के लिए जिला अस्पताल ही आना पड़ता है।
इन गांवों के लोग आते हैं इलाज के लिए
लोहाकोट, उड़ई, सानगांव, सौगांव, हराली, बमडोली, चौपता समेत कई गांवों की आबादी इलाज के लिए इसी अस्पताल पर निर्भर है।
यूपी शासनकाल में दो चिकित्सक, आयुर्वेदिक, फार्मासिस्ट समेत पूरा स्टाफ रहता था। वर्तमान में मात्र एक चिकित्सक के भरोसे अस्पताल चल रहा है। अस्पताल का उच्चीकरण तो नहीं हुआ लेकिन स्थिति पहले से और खराब हो गई।
- जगदीश कुमार पूर्व जिला पंचायत सदस्य।