पिथौरागढ़। कोरोना काल में भले ही पढ़ाई प्रभावित हो गई हो लेकिन अधिकतर बच्चों ने घर पर रहकर अपनी लेखनी को सुधारने का काम किया। हालांकि 40 फीसदी बच्चों का लेखन का अभ्यास छूटने से लेखनी बिगड़ गई। कोरोना के दौरान नगर के अधिकतर स्कूलों के 60 फीसदी बच्चों ने अपनी लेखन शैली को पहले से बेहतर किया। छात्रों ने कहा कि ऑनलाइन पढ़ाई के बाद उनके पास काफी समय रहता था, जिसके बाद उन्होंने अपनी सुलेख को पहले से बेहतर किया। ऑनलाइन पढ़ाई में कुछ बच्चों ने नोट्स बनाए तो कुछ ने इस पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।
बच्चे स्कूल खुलने के बाद अच्छा महसूस कर रहे हैं। बच्चों ने बताया कि ऑनलाइन कक्षा से बेहतर ऑफलाइन कक्षाएं हैं। कक्षाओं में बैठकर शिक्षकों से अपनी समस्याओं का समाधान आसानी से और शीघ्र हो जाता है जबकि ऑनलाइन पढ़ाई में कई बार शिक्षक अन्य छात्रों के सवालों का समाधान करने में व्यस्त रहते थे। ऐसे में कई बार फोन वेटिंग आता था। इससे सिर्फ समय की बर्बादी होती थी। लिखने या नोट्स बनाने सहित उनके कई अभ्यास भी छूट गए थे।
ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान लेखन कार्य नहीं हो पाए। सुलेख पहले से 10 फीसदी खराब हो गई है। ऑफलाइन पढ़ाई में इसे सुधारने का प्रयास कर रही हूं। ऑनलाइन पढ़ाई में घर में कई तरह की दिक्कतें भी होती हैं। - निवेदिता पाठक, सोर वैली पब्लिक स्कूल, पिथौरागढ़।
मैने अपनी सुलेख में पहले से अच्छा सुधार किया। ऑनलाइन पढ़ाई के बाद घर पर काफी समय मिल जाता था। इसके बाद अपनी राइटिंग को पहले से अच्छा किया। ऑनलाइन पढ़ाई में कोई टोकने वाला नहीं होता था। ऐसे में पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाती थी। - मनस्वी उप्रेती, सोर वैली पब्लिक स्कूल, पिथौरागढ़।
ऑनलाइन पढ़ाई में काफी दिक्कतें आई। ऑफलाइन पढ़ाई में शिक्षक से आमने सामने बात होती थी। वे हमारे चेहरे के भाव आसानी से समझकर सवाल भी करते हैं लेकिन ऑनलाइन में ऐसा संभव नहीं है। सुलेख में पहले के मुकाबले थोड़ी कमी आई है। - दीया गिरी, निखिलेश्वर चिल्ड्रंस एकेडमी, पिथौरागढ़।
ऑनलाइन पढ़ाई से सिर्फ सुलेख में सुधार आया। पढ़ाई तो नाममात्र की हो रही थी। किसी भी समस्या के लिए सिर्फ फोन ही करना पड़ता था। ऑफलाइन पढ़ाई में शिक्षक बोर्ड में अच्छे से समझाने का पूरा प्रयास करते हैं। इसका काफी फायदा होता है। - मानसी बिष्ट, निखिलेश्वर चिल्ड्रंस एकेडमी, पिथौरागढ़।
स्कूल जाने की उम्र के इन बच्चों को लंबे वक्त तक खुले से दूर रहना पड़ा
चंपावत। कोरोना के दौर ने हर वर्ग और हर उम्र के लोगों को कई तरह के अनुभव दिए। खट्टे भी और मीठे भी। नन्हे-मुन्ने बच्चे भी इसका अपवाद नहीं रहे। खेलने से लेकर स्कूल जाने की उम्र के इन बच्चों को लंबे वक्त तक खुले से दूर रहना पड़ा। अपने घर में रहने के लिए मजबूर बच्चों की चंचलता और उन्मुक्तता के साथ ही स्कूली पढ़ाई और खेल सब छूट गया।
ऑनलाइन पढ़ाई आधी-अधूरी रही, तो काफी कुछ भूल भी गए। कुछ समय पहले स्कूल खुले तो बच्चों को इन सबका सामना करना पड़ा। ऐसे में स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों को न केवल अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ी, बल्कि नए तरीके भी ईजाद करने पड़े। इन सबका नतीजा स्कूल आने वालों की बढ़ी तादाद के रूप में भी नजर आ रहा है। जहां इस जिले में 15367 छात्र-छात्राओं में से ऑनलाइन पढ़ने वाले महज 45.82 प्रतिशत (6981) ही रहे जबकि स्कूल जाने वालों का आंकड़ा अब 85 प्रतिशत पार हो गया है।
कोरोना के दौर में परिवार और पड़ोस में हुई परिस्थितियों का छोटे बच्चों पर असर शुरुआत में दिखा लेकिन स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों के साथ मनोवैज्ञानिकों के जरिये हुई काउंसिलिंग से सुधार हुआ। - ममता महर, शिक्षिका, सृजन, चंपावत।
कोरोना काल में स्कूल से दूरी से बच्चे पिछड़ गए थे। काफी बच्चे पढ़ाया भूल गए। पिछली कक्षाओं के कठिन पाठ्यक्रम को दोबारा पढ़ाने के लिए अतिरिक्त वक्त और अतिरिक्त मेहनत लगी। - कोमल जोशी, प्रधानाचार्या, सृजन, चंपावत।
कोरोना काल के अनुभवों से छोटे बच्चों को उबारना सचमुच नया अनुभव रहा। बच्चों को स्कूल में भी परिवार सरीखा वातावरण देने से वे धीरे-धीरे नए माहौल में ढल रहे हैं। - सुशीला गोस्वामी, शिक्षिका, सृजन, चंपावत।
कोरोना के बाद स्कूल खुलने पर अतिरिक्त सावधानी बरती गई। हर तीसरे दिन सैनिटाइज कर सर्दी-जुकाम होने पर बच्चों को स्कूल आने के बजाय आराम करने की सलाह देकर टीकाकरण के लिए भी प्रेरित किया गया। - डॉ. भुवन चंद्र जोशी, प्रबंधक, सृजन, चंपावत।