अमर उजाला के सहयोगियों की जुबानी सफर की कहानी
इस दूरी को तय करने में बाइक से साढ़े छह घंटे लगे। इस दौरान कई बार जान हलक तक आ गई क्योंकि पहाड़ से चट्टानें मौत बनकर झांक रहीं हैं। कब बोल्डर टूटकर सड़क पर गिरे और खबर लिखने के बजाय खुद खबर बनते देर नहीं लगेगी।
पीएम मोदी के दौरे के मद्देनजर चार अक्तूबर की सुबह छह बजे हम दोनों आदि कैलाश जाने के लिए दो पहिया वाहन से धारचूला से गुंजी के लिए रवाना हुए। इन दिनों धारचूला से आगे सड़क कटिंग का काम चल रहा है। रात को बारिश हुई थी लिहाजा सड़क कटिंग का मलबा कीचड़ में तब्दील हो गया था। पांच-छह किमी आगे चले तो सड़क के एक ओर पहाड़ी पर अटके बोल्डरों के गिरने की आशंका तो दूसरी ओर काली नदी का डरावना शोर।
आपकी जरा सी चूक हजार फीट नीचे काली नदी में जल समाधि दिला सकती है। एक बार लगा कि जानलेवा साफर कहीं हमारा आखिरी सफर न साबित हो। कुछ जगह हॉटमिक्स सड़क दिखती तो लगता कि आगे रास्ता ठीक होगा लेकिन ये सिर्फ भ्रम ही साबित हुआ। 500 मीटर बाद ही फिर उबड़-खाबड़ सड़क वाहन के साथ ही हम दोनों की परीक्षा लेने लगती है। जैसे-तैसे बुंदी से छियालेख तक 26 मोड़ पारकर छियालेख की चोटी पर पहुंचे।
आईटीबीपी के जवान जांच कर रहे थे तभी गुंजी की ओर से आ रहा एक बाइकर सड़क पर बने कीचड़ के तालाब में गिरा और चोटिल हो गया। सेना के जवानों ने उसे चेकपोस्ट तक पहुंचाया। यहां से गर्ब्यांग तक का सफर कुछ सुरक्षित रहा। उसके बाद फिर चट्टानी मार्ग शुरू हो गया और ऊपर लटकते बोल्डर फिर जानलेवा लगने लगे। धारचूला से गुंजी तक 72 किमी का सफर तय करने में हमें साढ़े छह घंटे लगे।
1998 में 60 कैलाश यात्रियों सहित 205 की गई थी जान
खतरनाक चट्टानों को देखकर समझ में आया कि बीआरओ ने किन कठिन हालात में पहाड़ियां काटकर सड़क बनाई होगी। नजंग पार किया तो मालपा आ गया। यहीं वर्ष 1998 में 60 कैलाश यात्रियों समेत 205 लोगों की दबकर मौत हो गई थी। पानी से गुजरने पर ऐसा लगा थम जाएगी सांस पेलसिती झरने में दो हजार फीट की ऊंचाई से गिर रहे पानी ने भिगो दिया। ऐसा लगा इस पानी से गुजरने में सांस थम जाएगी। सड़क पर बिखरे रोड़े बाइक का बैलेंस बिगाड़ देते तो लगता कि हजारों फीट नीचे खाई में अब गिरे की तब गिरे।