बाघ और गुलदार के लिए गाइड लाइन अलग हो : लखपत सिंह
अपनी बंदूक से 53 आदमखोर गुलदार और दो बाघों को मौत के घाट उतारने वाले उत्तराखंड के मशहूर शिकारी लखपत सिंह रावत की मानें तो बाघों और गुलदारों के लिए अलग-अलग गाइडलाइन जारी की जानी चाहिए। दोनों वन्यजीवों का रहन-सहन, व्यवहार और शिकार करने का तरीका अलग है।
बीते कुछ सालों में दोनों वन्यजीवों के व्यवहार में अंतर आया है। अब गुलदार झुंड में भी शिकार कर रहे हैं, पहले ऐसा नहीं होता था। गैरसैंण के ग्वाड़ गांव के रहने वाले लखपत वर्तमान में शिक्षा विभाग में बीआरसी के पद पर कार्यरत हैं। मार्च 2024 में वह रिटायर हो जाएंगे। उन्होंने अब तक कई आपरेशन को अंजाम दिया है। गोली का खर्च भी वह अपनी जेब से उठाते हैं।
बेटा अजय रावत भी पिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शिकारी बनने की राह पर है। लखपत बताते हैं, उन्होंने वर्ष 2009 में 12 गुलदार मारे। वर्ल्ड रिकार्ड के तौर पर दर्ज कराने के लिए वह प्रयासरत हैं। उन्होंने आदमखोर को मारने के लिए पहली बार वर्ष 2002 में बंदूक उठाई थी। तब उन्होंने 12 बच्चों को मौत के घाट उतारने वाले एक गुलदार को आठ माह की मशक्कत के बाद मारा था। लखपत बताते हैं, गुलदार को गोली का शिकार बनाने के दौरान वह खुद कई बार उसके हमले में बाल-बाल बचे हैं। ऐसा ही एक किस्सा बताते हुए वह कहते हैं, गजा में हम आदमखोर की तलाश में घात लगाकर बैठे थे। तभी उसने पीछे से उन पर हमला कर दिया। उन्होंने राइफल उल्टी कर गोली चला दी और गुलदार ढेर हो गया।
लखपत कहते हैं, गुलदार को मारना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि वन विभाग उन्हें ट्रेंकुलाइज गन दे तो वह जिंदा भी पकड़ सकते हैं, लेकिन उन्हें वन विभाग का सहयोग नहीं मिलता है। आज उत्तराखंड में ऐसे शिकारी वन कर्मियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं, जिन्हें उत्तराखंड का कोई अनुभव नहीं है।