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दो साल में प्राप्त किए त्रिमुखी रुद्राक्ष के 700 दाने

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थल (पिथौरागढ़)। पांच वर्ष पहले हरिद्वार से रुद्राक्ष के पौधे लाकर बगीचे में रोपने वाले डा. दिनेश चंद्र पाठक को उम्मीद नहीं थी कि थल घाटी में यह पौधे पनप पाएंगे, लेकिन उनकी यह आशंका निर्मूल साबित हो गई। पिछले साल रुद्राक्ष के दोनों पेड़ों से 300 दाने और इस साल 400 दाने रुद्राक्ष मिल गए। यह सभी त्रिमुखी रुद्राक्ष हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब पेड़ दस साल बाद परिपक्व अवस्था में पहुंचेगा तो एक मुखी रुद्राक्ष भी पैदा होने लगेंगे।
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ग्रामीण बैंक के प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त डा.पाठक को बागवानी का शौक है। उन्होंने अपने बगीचे में धतूरा, अशोक, इलायची, काफल, चेरी के पौधों का भी रोपण किया है। रुद्राक्ष का पौध लगाने के लिए उन्होंने सिर्फ प्रयोग किया था। जब रुद्राक्ष में फल आने लगे तो उनका उत्साह बढ़ गया।

डा. पाठक रुद्राक्ष के दानों का कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं कर रहे हैं। सभी दानों को सुखाकर उन्होंने घर में बने मंदिर में रखा है। बाद में वह इन दानों की माला बनाकर शिवजी के मंदिर में चढ़ाएंगे।
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रुद्राक्ष का महत्व
आमतौर पर साधु लोग ही रुद्राक्ष की माला पहनते हैं, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि रुद्राक्ष की माला पहनने से रक्तचाप नियंत्रित हो जाता है। यह बात अलग है कि रुद्राक्ष की माला धारण करने वाले को सात्विक जीवन जीना पड़ता है। उसे मांस, मदिरा से दूर रहना चाहिए। डा. पाठक कहते हैं कि थल घाटी में रुद्राक्ष का पौधा उगना और उसमें पर्याप्त मात्रा में फल आना अच्छा लक्षण है। आने वाले समय में इन पौधों का विस्तार किया जाएगा। अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे।
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