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इस मशाल की लौ कम मत होने देना

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पिथौरागढ़। कारगिल ने भारतीय इतिहास में अपना नाम अंकित कर लिया है। अब नई पीढ़ी का दायित्व बनता है कि 527 रणबांकुरों की आहुति के बाद जली कारगिल की मशाल को लौ को कम न होने दें। 60 दिन तक चले इस युद्ध के बाद 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने विजयश्री हासिल की थी। सैनिक कल्याण परिषद के सदस्य और पूर्व सैनिक अधिकारी नरेंद्र चंद का कहना है कि भारतीय सशस्त्र सेना इतनी सक्षम है कि वह भविष्य में कारगिल जैसे कई और इतिहास रचेगी।
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उन्होंने बताया कि कारगिल जम्मू-लेह सड़क पर स्थित है। कारगिल पर पाकिस्तान ने छद्म युद्ध को अंजाम दिया था। उसने भारतीय सेना के नियंत्रण वाली नियंत्रण रेखा पर अपने सैनिक, अर्धसैनिक और मुजाहिदीन तैनात कर दिए थे। इसकी भनक लगते ही भारतीय सेना के दो लाख जवान भी पूरे इलाके पर तैनात कर दिए गए। 26 मई 1999 से शुरू हुए इस युद्ध के दौरान पाकिस्तानी फौज को हार का सामना करना पड़ा था। इस युद्ध में पहली बार आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ और भारतीय सेना के रणकौशल की मिसाल देखने को मिली।

वह कहते हैं कि पाकिस्तान के खिलाफ 1948, 1962, 1965, 1971 में भी युद्ध हुए थे, लेकिन कारगिल युद्ध उन सभी से अलग इसलिए था कि यह दुर्गम पहाड़ी इलाके पर लड़ा गया। 26 जुलाई को पूरा देश कारगिल दिवस मनाएगा। नई पीढ़ी को संदेश दिए जाएंगे। भारतीय सेना के पराक्रम की गाथा से देश का हर बच्चा वाकिफ होगा।
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