पिथौरागढ़ । लक्ष्मण सिंह महर परिसर के वनस्पति विज्ञान विभाग में कार्यरत सहायक प्राध्यापक डॉ. कमलेश कुमार भाकुनी और शोध छात्रा शीतल महर का शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल ऑफ एनिमल इनवायरमेंट में प्रकाशित हुआ है। इसका विषय डायवर्सिटी ऑफ इनवेसिव प्लांट स्पेसीज ऑफ पिथौरागढ़ रिजन इन कुमाऊं हिमालया उत्तराखंड है।
डॉ. भाकुनी ने बताया कि शोध में पिथौरागढ़ जिले में बाहर से आकर फैलने वाले और स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने (अतिक्रमणकारी) पौधों की प्रजातियों की विविधता और फैलाव का अध्ययन किया गया।
उन्होंने बताया कि 119 ऐसे पौधों की पहचान की गई जो अतिक्रमण फैलाकर जिले की जैव विविधता को प्रभावित कर रहे हैं। यह प्रजातियां मिट्टी के पोषण व नमी को सोख कर स्थानीय उपयोगी पौधों को बढ़ने नहीं देती हैं।
उन्होंने बताया कि चंडाक, आंवलाघाट, हाट कालिका जल ग्रहण क्षेत्र में ऐसे आक्रामक पौधे मूल वनस्पतियों के लिए खतरा बन रहे हैं। डॉ. भाकुनी ने बताया कि आक्रामक प्रजातियों के फैलाव का पता लगाना जटिल है। जब इन प्रजातियों की संख्या कम होती है तब इन्हें आसानी से पहचाना नहीं जा सकता है। ये प्रजातियों कम समय में तेजी से फैलकर बड़ी संख्या में अपना समूह बना लेती हैं। उन्होंने बताया कि आक्रामक प्रजातियां स्थानीय पौधों की जैव विविधता के लिए खतरा पैदा करती हैं।
आक्रामक पौधों का इस तरह हो रहा है प्रयोग
वनस्पति विज्ञान के सहायक प्राध्यापक डॉ. कमलेश भाकुनी ने बताया कि लोगों ने आक्रामक पौधों के उपयोग के अपने तरीके विकसित किए हैं। इनका उपयोग सजावटी पौधों, औषधीय उपचार, चारे आदि के रूप में किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि अधिकांश आक्रामक प्रजातियां शाकीय पौधे हैं। इन पौधों की उत्पत्ति मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय अमेरिका से जुड़ी हुई पाई गई है। इन पौधों में लेंटाना, कुमर, गाजर घास, चिल्मोड़ा, दूधिया आदि हैं।