बिना दाम के काम के बोझ से दबी हैं महिलाएं
पिथौरागढ़। पहाड़ के गांवों में महिलाएं बिना दाम के ही काम के बोझ से दबी हैं। कई गांव तो ऐसे हैं, जहां पर महिलाओं को कम से कम चार घंटे का समय पानी भरने में ही खर्च करना पड़ता है। जंगल से लकड़ी लाना, जानवरों के लिए चारा जुटाना, घर के अन्य छोटे-मोटे कामों का महिलाओं को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता, लेकिन उनकी ऊर्जा जरूर खर्च हो जाती है।
अर्पण संस्था की ओर से आयोजित कार्यशाला में मंगलवार को यह मुद्दे उठाए गए। कार्यशाला में मौजूद वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने स्वीकार किया कि ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं पर काम का बोझ अधिक है। सरकार ऐसी कोशिश करेगी, जिससे ग्रामीण महिलाओं को काम कम करना पड़े। मुख्य रूप से हर गांव को पेयजल की सुविधा देने के लिए सरकार कार्ययोजना तैयार कर रही है। इसका लाभ महिलाओं को मिलेगा।
अर्पण की अध्यक्ष रेणु ठाकुर ने पिथौरागढ़ जिले के तीन गांवों तोली, किमखोला, बलुवाकोट की केस स्टडी कार्यशाला में रखते हुए कहा कि इन गांवों में आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि है। कृषि का सारा काम महिलाएं करती हैं। इन गांवों में महिलाओं की औसत कमाई का स्तर बहुत कम है। उन्होंने कहा कि गांवों में पेयजल की सुविधा दी जाए और हर घर को उज्ज्वला योजना में रसोईगैस का कनेक्शन दिया जाए तो महिलाओं को कम श्रम करना पड़ेगा। ईंधन के लिए लकड़ी एकत्र करना मुख्य काम होता है। इसमें महिलाओं का समय ज्यादा बर्बाद होता है। यदि हर घर को रसोईगैस का कनेक्शन मिल जाए तो जंगल जाने की मजबूरी नहीं रहेगी।
गर्मियों में पानी के संकट से हर गांव परेशान रहता है। श्रम के कारण महिलाओं के नींद लेने का समय भी कम रहता है। इसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। कार्यशाला में यह बात सामने आई कि ग्रामीण महिलाओं का आर्थिक स्तर ऊंचा उठाने के लिए मनरेगा के तहत अनिवार्य रूप से साल में 100 दिन का रोजगार दिया जाए, उनको समय पर भुगतान किया जाए, बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान किया जाए। कार्यशाला में विभिन्न विभागों के अधिकारी और अर्पण के कार्यकर्ता मौजूद थे।