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बस्तड़ी के उपजाऊ खेत अब भी मलबे के तले

Tue, 27 Jun 2017 11:01 PM IST
संजू पंत/अमर उजाला, डीडीहाट
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आपदा प्रभावित बस्तड़ी में इस तरह बंजर पड़े हैं खेत - फोटो : अमर उजाला
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बस्तड़ी में 30 जून 2016 की रात आई आपदा के बाद लोगों ने गांव तो छोड़ दिया, लेकिन लोग जमीन का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इसी जमीन से लोग जानवरों के लिए चारा एकत्र कर रहे हैं। बस्तड़ी गांव के लोगों के पास करीब एक हजार नाली जमीन है, लेकिन कृषि योग्य 100 नाली जमीन मलबे से पट गई। इस जमीन पर लोग एक साल से खेती नहीं कर पाए हैं। सरकार और भूगर्भ विभाग ने गांव की जमीन को खतरनाक घोषित करते हुए उसे खाली करने का आदेश तो दे दिया, लेकिन अब तक जमीन से मलबा हटाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।
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एक जुलाई 2016 की सुबह बस्तड़ी गांव के लोगों ने गांव छोड़ दिया था और सिंघाली के स्कूल भवनों, किराए के मकानों में आकर रहने लगे। लोगों की जरूरत धीरे-धीरे बढ़ने लगी। उन्होंने बच्चों के दूध के लिए इन अस्थायी आवासों में ही दो-दो जानवर पालने शुरू कर दिए और कुछ परिवारों ने बकरियां भी पाल ली। सिंघाली के आसपास जानवरों के चारे के लिए घास नहीं मिलती तो महिलाएं बस्तड़ी गांव जाकर चारे की व्यवस्था करती हैं।

बस्तड़ी की जमीन बेहद उपजाऊ थी। इसमें धान, गेहूं, मसूर, उड़द, सोयाबीन का इतना अच्छा उत्पादन होता था कि लोगों के सालभर की व्यवस्था हो जाती थी। इन खेतों की मेड़ों पर लोग सब्जी और तिलहन वाली फसलें भी बोते थे। इस सीजन में लौकी, कद्दू, ककड़ी बहुतायत में पैदा हो जाती थी। एक साल से मलबे से पटे इन खेतों में सिर्फ घास उग पा रही है। बस्तड़ी निवासी शंकर दत्त भट्ट का कहना है कि बस्तड़ी की जमीन का मोह कभी नहीं छूट सकता। लोगों की जड़ें इसी गांव में हैं और वह चाहते हैं कि जमीन को फिर से फसल बोने लायक बनाया जाए। इसके लिए वह हल्के ट्रैकर की मांग भी कर चुके हैं। 
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बस्तड़ी में पानी के स्रोत गायब
बस्तड़ी की आपदा ने प्राकृतिक स्रोतों को तबाह कर दिया। पानी की योजना मलबे की चपेट में आकर नष्ट हो गई। गांव में स्थित चार प्राकृतिक स्रोत पूरी तरह नष्ट हो गए। उनका पानी गायब हो गया। यह बात अलग है कि लोगों को इस समय इस पानी की जरूरत नहीं है, लेकिन आपदा के कारण जिस तरह गांव का भूगोल ही बदल गया था, उससे एक बड़ी शून्यता सामने आई है।

अब खेती के लिए सामूहिकता नहीं दिखती
बस्तड़ी के लोग बारिश के मौसम में पानी एकत्र कर करीब 25 नाली जमीन पर धान की रोपाई लगाते थे। रोपाई के समय सारा गांव एकजुट होता था। सामूहिकता की भावना दिखती थी, लेकिन अब खेत ही नहीं बचे तो रोपाई लगने का सवाल नहीं उठता। महिलाओं को सबसे ज्यादा टीस इसी बात की है कि आपदा ने उनकी सामूहिकता और सहभागिता की भावना को छीन लिया।

सरकार ने खेतों को बचाने का प्रयास नहीं किया
आपदा के बाद प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी गांव का दौरा किया था। बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई, लेकिन गांववालों की जमीन को बचाने के लिए किसी ने कोई प्रयास नहीं किया। गांव के लोग बताते हैं कि जमीन की जरूरत लोगों को हमेशा रहेगी। सब्जी, चारा, अनाज के लिए इस जमीन को फिर से आबाद किया जाना बेहद जरूरी है।
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