धारचूला (पिथौरागढ़)। यहां ब्लाक सभागार में आयोजित मौनपालन प्रशिक्षण शिविर में विशेषज्ञों ने काश्तकारों को बताया कि मौनपालन का काम अपनाने पर सिर्फ एक बार ही धन खर्च करना पड़ता है। उसके बाद लगातार कमाई होती रहती है। पहाड़ों में प्राकृतिक रूप से भी कई मौनवंश पाए जाते हैं और शहद देने वाली मधुमक्खी को पालने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती। शहद को बेचने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती। आज कई दवा कंपनियों को शहद की जरूरत रहती है। इसके अलावा लोग घरों में भी शहद का उपयोग करते रहते हैं।
मुख्य विकास अधिकारी आशीष चौहान ने कहा कि सरकार समूह बनाकर मौनपालन से महिलाओं को जोड़ने वाली योजना पर ज्यादा जोर दे रही है। उन्होंने कहा कि धारचूला क्षेत्र में की काश्तकार मौनपालन की दिशा में बेहतर काम कर रहे हैं। जिला उद्यान अधिकारी डा. मीनाक्षी जोशी ने कहा कि उनका विभाग लोगों को मौनपालन के लिए प्रेरित करने को कई योजनाएं चला रहा है। नैनीताल से आए मौनपालन विशेषज्ञ हरीश चंद्र तिवारी ने मधुमक्खियों पर लगने वाली बीमारी, उसकी रोकथाम के बारे में बताया। कहा कि कुछ कीट भी मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाते हैं। क्षेत्र के मौनपालक दुर्गा सिंह धामी ने लोगों को मौनपालन, विपणन के बारे में विस्तार से बताया। इस मौके पर ज्येष्ठ उद्यान निरीक्षक वीरेंद्र पांडे, ब्लाक प्रमुख नेत्र सिंह कुंवर समेत कई काश्तकार उपस्थित थे।