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पुरानी जीवनशैली भूलने से आपदा ने किया ज्यादा परेशान

Thu, 18 Jul 2013 08:53 AM IST
वेद विलास उनियाल
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पहाड़ों के लोग पुरानी जीवनशैली भूल रहे हैं। अब घरों में कुदाल, गैती, बेलचा, फावड़ा, कुल्हाड़ी, बसूला नहीं मिलता। अब  आपदा या असमान्य स्थितियों में श्रमदान भी कम ही दिखता है।
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इस बार पहाड़ों में हर घाटी में मची उथल-पुथल और त्रासदी में केवल सरकारी तंत्र का ही इंतजार किया गया। बहुत कम जगहों पर गांव के युवक अपने स्तर पर पगडंडी ठीक करना, पुश्ता निर्माण, हल्के मलबे को हटाना, झाड़, झंकार की सफाई करना जैसे काम करते देखे गए। जबकि पहाड़ों में पहले जब कभी आपदाएं आई या मौसम बदलने पर उसके अनुरूप ढलने की जरूरत हुई, तो लोग खुद को ढाल देते थे।

अपने स्तर पर करते थे समाधान
पहाड़ों में सदियों से लोगों के पास जीवन यापन के अपने तौर-तरीके थे। इसलिए बारिश, बर्फबारी, सर्द हवाओं से सामने करना का अपने स्तर पर एक तंत्र होता था। जब कभी गांव में कोई प्राकृतिक समस्या आती थी, तो लोग मिलजुलकर अपने स्तर पर भी उसका समाधान करने की कोशिश करते थे।
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यहां तक कि बादल फटने, भूस्खलन होने की विकट स्थिति के बाद भी लोग गांव को पटरी पर लाने की कोशिश करते थे। लेकिन अब गांवों में पहाड़ों के अनुरूप घरेलू उपकरण भी नहीं मिलते हैं।

एक उदाहरण देखिए। गुप्तकाशी के नागजगई गांव के निकट देखने को मिली। जब सड़क पर आए मलबे  को साफ करने के लिए युवा तो आगे आए। लेकिन उन्हें वहां करीब डेढ़ किमी दूर चलकर एक गांव में सिर्फ एक बेचला ही मिल पाया। यही हाल पूरे उत्तराखंड के गांवों का है।

गांव में युवा नहीं रह गए
इसके अलावा एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि गांव में युवा रह नहीं गए हैं। या तो महिलाएं हैं या रिटायर्ड फौजी। जो युवा नौकरी के लिए बाहर चले जाते हैं, वह गांव के होकर भी वे गांव के जीवन को नहीं अपना पाते हैें। गांव में जब कभी वे आते भी हैं, तो उनमें और शहरी युवाओं में कोई फर्क नजर नहीं आता।

पहाड़ों में रहने के लिए हमें पहाड़ों के सिस्टम के अनुरूप ढलना होगा। पिछले कुछ समय से लोग पहाड़ों में तो रह रहे हैं। लेकिन उन्होंने अपनी जीवन शैली मैदान के अनुरूप कर दी है। इससे बड़ी विपदा की बात तो अलग है। थोड़ी भी दिक्कत होने पर वे घबरा जाते हैं।
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-एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल

वर्ष 1985 के बाद से जब पंचायतों में पैसा आना शुरू हुआ, उसने सामूहिक सभागिता और श्रमदान की परंपरा खत्म कर दी।
- समाजसेवी हेम गैरोला

कुछ सरकारी योजनाओं और कुछ ठेकेदारी प्रथा ने भी युवाओं में केवल कमाने वाली सोच पैदा कर दी है।
- समाज सेवी डा. हरपाल सिंह नेगी
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