पिछले सितंबर को पहाड़ी पर बादल फटने से कुछ ही पल में हंसता खेलता मंगोली गांव तबाह हो गया था। कई मकान ढहे, कई लोग मलबे में दब गए थे।
गांव के ऊपर पहाड़ी पर आई बड़ी बड़ी तीन दरारें आज भी उस तबाही के चिह्न छोड़े हुए हैं। ज्यादा समय नहीं हुआ है। पर अब गांव के लोग फि र संभल रहे थे, कुछ नए घर भी बनने लगे थे। बीते दु:ख को भुलाने की कोशिश करते कि केदारनाथ की आपदा से वो फिर सहम गए हैं।
केदारनाथ गए गांव के तीन लोग तो विपत्ति से जूझ कर किसी तरह बच कर आए हैं, लेकिन इस घटना से लोग फि र डरने लगे हैं। अब उनकी जुबान पर फिर आपदा की ही बातें हैं।
उतनी ही रौनक थी
उखीमठ से लगभग पांच किमी की दूरी पर बांज, देवदार, बुरांश जैसे पेड़ और नारंगी, माल्टा के फलदार वृक्षों के साथ साथ एक व्यवस्थित रास्ता इस गांव की ओर ले जाता है। लेकिन यह गांव का एक छोर हैं। दूसरा छोर उतना ही विकृत है। लेकिन पिछली 13 सितंबर से पहले वहां भी उतनी ही रौनक थी।
रात में कहर बरपा और देखते ही देखते यह गांव तबाह हो गया। पानी पूरे बेग से आया। बड़े-बड़े मकानों को ध्वस्त कर गया। एक घर में पढ़ाई कर सो गई रजनी के लिए वह आखिरी नींद साबित हुई। एक महीने बाद उसे दुल्हन बनना था। वहीं एक दूसरे घर के मलबे से टकरा कर दूसरा मकान ढहा तो पांच और लोग जिंदा दफन हो गए थे।
इनमें लोक कलाकार मुकेश भट्ट भी था, जो गांव के लोगों की जिंदगी को बचाने के प्रयास में अपनी जिंदगी भी खो बैठा। चक्रव्यूह नाटक में अभिमन्यु की भूमिका निभाने वाले कलाकार मुकेश को आपदा ने भी घेर कर मारा था। वह भी असहाय था।
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उस फौजी आशुतोष का घर भी नजर आता हैं, जो उसी दिन सीमा से लौटा था। आपदा ने उसकी और उसकी पत्नी रुचि की जिंदगी भी ले ली। गांव ने इस महाविपत्ति को झेलने के बाद लोगों ने फिर अपने को तैयार किया। कुछ टूटे मकान तो उस गवाही बने, पर धीरे -धीरे गांव फिर संभलने लगा था।
यह गांव कुछ महीने की खामोशी के बाद फिर थोड़ी करवट लेने लगा था। फिर लोग खेतों की ओर जाने लगे थे। लेकिन केदारनाथ की आपदा ने फिर लोगों को सहमा दिया है। यहां के कुछ लोग केदारनाथ में अपने कारोबार से जुड़े हुए हैं।
गांव में कोई नहीं सोया
16 की रात फिर इस गांव में कोई नहीं सोया। हर कोई डर गया कि गांव के लिए फिर कोई बुरी सूचना न आए। केदारनाथ गए लोगों में उस लड़की के पिता भी थे, जो पिछले सितंबर को मलबे में दब गई थी। तब लड़की तो नहीं बची थी, लेकिन इस बार उसका पिता मदन सिंह किसी तरह विपदा से जूझता हुआ लौट आया। लेकिन वह अभी भी दहशत में है। उनका कहना है कि उस दिन अगर केदारनाथ में वह पावर हाउस में न होकर मंदिर में होता तो फिर न जाने क्या होता।
बस वह बाल-बाल बच गया। बड़ा जोर का धमाका था। उसे एक पल कुछ नहीं सूझा। फिर तो चारों ओर पानी ही पानी था। सब अपने जीवन को बचा रहे थे। वह कहते हैं, पिछली बार विपदा आई तो बेटी खोई,. इस बार मैं संकट में फंसा अब आगे जीवन में न जाने क्या क्या होगा। गांव के लोग भी यही कहते हैं, हमेशा डर बना रहता है। कब पानी आ जाए, कब जमीन हिलने लग जाए। अब तो हल्का बादल भी गरजता है, तो हम बाहर आ जाते हैं।
आपदाएं मनोबल तोड़ती हैं
इसी गांव के संस्कृतकर्मी डॉ राकेश भट्ट कहते हैं कि बहुत कोशिश की थी कि गांव के लोग उस दुख से बाहर निकल जाएं। लेकिन ऐसी आपदाएं मनोबल तोड़ देती हैं। फिर भी कोशिश होगी कि गांव के लोगों को सहारा दिया जाए। उनके आसपास सहानुभूति का माहौल भी होना चाहिए।
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