जलप्रलय का असर अब सरहदी गांवों में भी पर दिखने लगा है। भारत-तिब्बत सीमा से सटी नीती घाटी के ग्रामीण हर बार नवंबर माह में अपने शीतकालीन गांवों को लौटते थे। इस बार आपदा ने उन्हें अक्तूबर में ही घाटी छोड़ने को मजबूर कर दिया है।
जरूरी वस्तुओं की किल्लत से अब तक 195 परिवार घर छोड़ चुके हैं। इन गांवों की जिम्मेदारी अब आईटीबीपी और सेना ने संभाल ली है।
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मोटर मार्ग कई जगहों पर जानलेवा
चमोली जिले के सीमांत गांव कौड़िया, छिनका, बौंला, सेलवानी, पुरसाड़ी, मंगरोली, डिडोली, कुमारतोली, बाजपुर, देवलीबगड़, तेफना, बिरही, कालेश्वर और देवलकोट के ग्रामीण हर वर्ष मई में सीमा पर बसे अपने मूल गांव नीती, बांपा, कैलाशपुर, मलारी, द्रोणागिरी, गमशाली, महरगांव, गुरगुटी, फरकिया, कागा, कोठार, गरपक, जेलम, कोषा, जुम्मा और सेंगला में खेती करने जाते हैं और नवंबर तक वहीं रहते हैं।
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इस बार जल प्रलय के चलते सरहद पर बसे ग्रामीणों को सड़क, खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। जोशीमठ-मलारी-नीती मोटर मार्ग अभी भी कई जगहों पर जानलेवा बना है।
मीलों दूरी पैदल नापनी पड़ी
रास्ते और पुलिया क्षतिग्रस्त होने से ग्रामीणों को गांवों तक जाने के लिए मीलों दूरी पैदल नापनी पड़ी। गमशाली के ग्रामीणों को एक माचिस की डिबिया के लिए 13 किमी. की पैदल दूरी तय करनी पड़ी।
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नतीजा यह है कि इस बार आपदा की त्रासदी झेल चुके लोग एक माह पूर्व ही अपने शीतकालीन प्रवास की ओर कूच कर चुके हैं। अभी तक नीती गांव से 40, मेहरगांव से 15, मलारी से 70, बांपा से 23 और गमशाली से 47 परिवार घाटी से निचले क्षेत्रों में पहुंच गए हैं।
निचले क्षेत्रों में करेंगे व्यापार
नीती घाटी के ग्रामीण शीतकाल में निचले क्षेत्रों में छह माह तक अपनी भेड़-बकरियों से निकाली गई ऊन और सीमांत क्षेत्र में उत्पादित राजमा, आलू, फाफर और सब्जियों का व्यापार करते हैं। 1962 से पूर्व भोटिया जनजाति के तिब्बत में ऊन का व्यापार के लिए जाते थे और तिब्बती अपने उत्पादों को बेचने घाटी में आते थे। 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के बाद से यह व्यापार भी बंद हो चुका है।
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आपदा के चलते रसद और आवगमन की दिक्कतें झेलनी पड़ी। पशुपालन और कृषि उत्पादों पर भी आपदा की मार पड़ी। इससे लोग एक माह पूर्व ही घाटी छोड़ने को मजबूर हो गए।
- देव सिंह राणा, निवासी मलारी।