अविभाजित उत्तर प्रदेश शासनकाल में 1994 में हुए शर्मनाक रामपुर तिराहा कांड, मसूरी और खटीमा जैसे गोलीकांडों में प्रदेश और देश के किसी साहित्यकार ने सम्मान क्यों नहीं लौटाया। वर्ष 1980 के दशक में शराब माफिया के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले निर्भीक पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या पर भी किसी ने सम्मान क्यों नहीं लौटाया।
भाजपा प्रदेश विधि प्रकोष्ठ के सह संयोजक वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण कुमार भट्ट ने असहिष्णुता के नाम पर सम्मान वापस करने वाले साहित्यकारों से यह सवाल किया है। कहा कि पत्रकार स्व. उमेश डोभाल अपनी व्यक्तिगत लड़ाई न लड़कर एक सामाजिक बुराई के खिलाफ लड़ रहे थे। उस वक्त शराब माफिया के भय से लोगों की जुबान बंद हो गई थी। उत्तराखंड राज्य प्राप्ति के लिए आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर, खटीमा और मसूरी के नर संहार हो रहे थे, तब भी आज की तरह सम्मान लौटाने वाले नदारद क्यों रहे। यदि सम्मान वापसी करने वाले किसी प्रश्न के समाधान के लिए दबाव बनाना चाहते हैं तो वे जनता के बीच जाकर अपनी बात रखें तथा अपने प्रश्न के समाधान के लिए जन-आंदोलन खड़ा करें।